महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है जिसमें राज्य के 50 तेंदुओं को गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस फाउंडेशन के वनतारा वन्यजीव संरक्षण केंद्र भेजने की तैयारी है। सरकार का कहना है कि राज्य में बढ़ते मानव-तेंदुआ संघर्ष को कम करने और वन्यजीव संरक्षण के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। हालांकि वन्यजीव कार्यकर्ताओं और पशु प्रेमियों ने इस फैसले का विरोध शुरू कर दिया है और इसे जंगली जानवरों के प्राकृतिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।
महाराष्ट्र से 50 तेंदुए वनतारा भेजने का फैसला, फैसले पर भड़के पशु प्रेमी
महाराष्ट्र सरकार के एक फैसले ने वन्यजीव संरक्षण को लेकर नई बहस छेड़ दी है। राज्य सरकार ने बढ़ते मानव-तेंदुआ संघर्ष को कम करने के लिए 50 तेंदुओं को गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस फाउंडेशन के वनतारा वन्यजीव बचाव और संरक्षण केंद्र भेजने का निर्णय लिया है। सरकार का कहना है कि महाराष्ट्र के कई इलाकों में तेंदुओं की संख्या बढ़ने और उनके आबादी वाले क्षेत्रों में आने से खतरे की स्थिति बन रही है। ऐसे में कुछ तेंदुओं को सुरक्षित संरक्षण केंद्रों में स्थानांतरित कर मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इस फैसले के सामने आते ही वन्यजीव कार्यकर्ताओं और पशु प्रेमियों ने विरोध शुरू कर दिया है और इसे जंगली जानवरों के प्राकृतिक अधिकारों के खिलाफ बताया है।
मानव-तेंदुआ संघर्ष कम करने के लिए उठाया गया कदम
महाराष्ट्र के वन मंत्री गणेश नाइक ने बताया कि राज्य में कई क्षेत्रों में तेंदुओं की मौजूदगी बढ़ गई है और वे अक्सर गांवों तथा शहरों के बाहरी इलाकों में दिखाई दे रहे हैं। इससे लोगों में डर का माहौल बन रहा है और कई बार मवेशियों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई हैं। सरकार का मानना है कि तेंदुओं को सुरक्षित संरक्षण केंद्रों में भेजने से न केवल लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी बल्कि जानवरों को भी बेहतर देखभाल मिल सकेगी। वन विभाग के अनुसार राज्य में पकड़े गए कुल 67 तेंदुओं को विभिन्न स्थानों पर स्थानांतरित करने की योजना बनाई गई है, जिनमें से 50 तेंदुओं को जामनगर के वनतारा केंद्र भेजने का प्रस्ताव है। यह केंद्र घायल और संकटग्रस्त वन्यजीवों के इलाज और संरक्षण के लिए जाना जाता है और यहां आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं।
जुन्नार क्षेत्र से होंगे अधिकतर तेंदुओं का स्थानांतरण
वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पुणे जिले के जुन्नार क्षेत्र में मानव-तेंदुआ संघर्ष की घटनाएं सबसे ज्यादा सामने आई हैं। ग्रामीण इलाकों में तेंदुओं के आने से लोगों में भय का माहौल है और कई बार पशुओं पर हमले की घटनाएं भी हुई हैं। इसी वजह से नवंबर 2025 में पहली बार इन तेंदुओं को स्थानांतरित करने की योजना पर विचार किया गया था। इसके बाद जामनगर स्थित वनतारा केंद्र की टीम ने महाराष्ट्र के बचाव केंद्रों का निरीक्षण कर वहां रखे तेंदुओं को स्थानांतरित करने की व्यवहार्यता का आकलन किया। अधिकारियों का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक अध्ययन और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर की जा रही है ताकि जानवरों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
पहले चरण में भेजे जाएंगे 20 तेंदुए
वन विभाग की योजना के अनुसार तेंदुओं को चरणबद्ध तरीके से वनतारा केंद्र भेजा जाएगा। पहले चरण में लगभग 20 तेंदुओं की पहचान की गई है जिन्हें जल्द ही जामनगर स्थानांतरित किया जा सकता है। जुन्नार डिवीजन की सहायक वन संरक्षक स्मिता राजहंस ने बताया कि पहले चरण के जानवरों की सूची तैयार कर ली गई है और संभव है कि एक सप्ताह के भीतर उनका पहला जत्था वनतारा केंद्र पहुंच जाए। इसके बाद स्थिति का आकलन किया जाएगा और दूसरे चरण में अन्य तेंदुओं को भेजने की प्रक्रिया शुरू होगी।
पशु प्रेमियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का विरोध
सरकार के इस फैसले के सामने आते ही कई वन्यजीव कार्यकर्ताओं और पशु प्रेमियों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। पर्यावरण संगठनों का कहना है कि जंगली जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास से दूर भेजना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। नैटकनेक्ट फाउंडेशन के निदेशक बी एन कुमार ने कहा कि तेंदुओं को जंगलों में ही रहना चाहिए क्योंकि वही उनका प्राकृतिक घर है। उन्होंने कहा कि किसी संरक्षण केंद्र या सीमित क्षेत्र में भेजने से जानवरों के प्राकृतिक व्यवहार पर असर पड़ सकता है और उन्हें नए वातावरण में ढलने में कठिनाई हो सकती है।
वन्यजीव कार्यकर्ताओं ने उठाए गंभीर सवाल
बीड के वन्यजीव कार्यकर्ता नितिन अलकुटे ने भी इस फैसले की आलोचना की है। उनका कहना है कि पिछले तीन महीनों से वे अहिल्यानगर जिले में छोटे पिंजरों में रखे गए 21 तेंदुओं को रिहा कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि लंबे समय तक पिंजरों में रखने से जानवरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और यह वन्यजीव संरक्षण की मूल भावना के खिलाफ है। उनका कहना है कि इन तेंदुओं को उनके प्राकृतिक जंगलों में वापस छोड़ा जाना चाहिए, न कि उन्हें किसी अन्य राज्य के संरक्षण केंद्र में भेजा जाना चाहिए।
जंगलों में अतिक्रमण को बताया असली वजह
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि मानव-तेंदुआ संघर्ष की असली वजह जंगलों में बढ़ता अतिक्रमण और खनन गतिविधियां हैं। वनशक्ति एनजीओ के पर्यावरणविद् डी स्टालिन का कहना है कि जब जंगलों का क्षेत्र लगातार घटता है तो जंगली जानवरों के लिए रहने की जगह कम हो जाती है। ऐसे में वे भोजन और आश्रय की तलाश में मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में तेंदुओं को स्थानांतरित करना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है बल्कि जंगलों की सुरक्षा और संरक्षण पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
सरकार ने फैसले को बताया जरूरी कदम
वहीं महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह वैज्ञानिक सलाह और वन्यजीव विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर लिया गया है। वन मंत्री गणेश नाइक के अनुसार सरकार का उद्देश्य न तो तेंदुओं को नुकसान पहुंचाना है और न ही उन्हें कैद करना, बल्कि उन्हें सुरक्षित और बेहतर वातावरण उपलब्ध कराना है। उनका कहना है कि राज्य में बढ़ते मानव-तेंदुआ संघर्ष को नियंत्रित करना भी उतना ही जरूरी है ताकि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके। सरकार का दावा है कि वनतारा केंद्र में जानवरों की देखभाल के लिए आधुनिक सुविधाएं मौजूद हैं और वहां तेंदुओं को सुरक्षित माहौल मिलेगा।