नई दिल्ली: ईरान पर अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले में आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल मच गई है। रूस, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी, जबकि कई पश्चिमी देशों ने खुलकर इजरायल-अमेरिका के पक्ष में बयान दिए। इसी बीच भारत की चुप्पी ने नया सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर भारत ने अब तक न तो निंदा की और न ही शोक संदेश जारी किया। सरकार बार-बार सिर्फ इतना कह रही है कि पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और संवाद जरूरी है।
भारत की कूटनीतिक रणनीति क्या है?
विश्लेषकों का मानना है कि भारत का यह रुख सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भारत लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलता आया है। इसका अर्थ यह है कि भारत किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट में बिना जल्दबाजी के संतुलित और राष्ट्रहित-आधारित निर्णय लेता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत ने किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने की बजाय शांति की अपील की थी। वही मॉडल इस बार पश्चिम एशिया में अपनाया गया है।
एक तरफ इजरायल-अमेरिका, दूसरी तरफ ईरान
- भारत के लिए स्थिति जटिल है।
- इजरायल भारत का बड़ा रक्षा साझेदार है।
- अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं।
- वहीं ईरान ऊर्जा आपूर्ति और चाबहार बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट में भारत के लिए अहम रहा है।
अगर भारत खामेनेई की मौत की खुलकर निंदा करता, तो अमेरिका और इजरायल के साथ संबंधों पर प्रभाव पड़ सकता था। दूसरी ओर यदि खुलकर समर्थन देता तो ईरान और खाड़ी क्षेत्र में स्थित भारतीय हित प्रभावित हो सकते थे। यही वजह है कि भारत ने संतुलन की नीति अपनाई।
ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी में भारतीय हित
भारत की तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है। लाखों भारतीय नागरिक सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों में काम करते हैं। इन देशों ने भी फिलहाल सीमित या संयमित प्रतिक्रिया दी है। भारत की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो और क्षेत्र में रहने वाले भारतीय सुरक्षित रहें। ऐसे में तेज बयानबाजी से बचना व्यावहारिक निर्णय माना जा रहा है।
खामेनेई के पुराने बयान भी बने कारक
सरकारी सूत्रों के अनुसार, आयतुल्लाह अली खामेनेई ने कई मौकों पर भारत के आंतरिक मसलों पर टिप्पणी की थी—कश्मीर, अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन कानून और दिल्ली दंगों के संदर्भ में उनके बयान भारत सरकार के लिए असहज रहे थे। इन बयानों ने द्विपक्षीय संबंधों में खटास भी पैदा की थी। ऐसे में भारत की ओर से श्रद्धांजलि न जारी करना कई विश्लेषकों के अनुसार “व्यक्तिगत दूरी” का संकेत भी माना जा रहा है।
वैश्विक प्रतिक्रिया का पैटर्न
दिलचस्प बात यह है कि भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जिसने श्रद्धांजलि नहीं दी। जी7 देशों में से किसी ने आधिकारिक शोक संदेश जारी नहीं किया। जापान और जर्मनी ने भी केवल स्थिरता की अपील की है। खामेनेई की मौत की खुलकर निंदा करने वालों में रूस, चीन, पाकिस्तान, तुर्की और उत्तर कोरिया जैसे देश शामिल हैं। दूसरी ओर यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय संघ के कई देशों ने अमेरिका-इजरायल के रुख का समर्थन किया है।
घरेलू राजनीति में उठे सवाल
भारत के कुछ हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। विपक्षी दलों ने सरकार से स्पष्ट रुख अपनाने की मांग की है। हालांकि, सरकार ने अभी तक अपने आधिकारिक बयान में केवल “संवाद और कूटनीति” पर जोर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार घरेलू राजनीति के बजाय अंतरराष्ट्रीय संतुलन को प्राथमिकता दे रही है।
आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत ने पश्चिम एशिया की राजनीति को नया मोड़ दिया है। भारत का संतुलित रुख इस बात का संकेत है कि बदलते वैश्विक समीकरणों में नई दिल्ली किसी भी जल्दबाजी से बचना चाहती है। यह चुप्पी कमजोरी नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन की अभिव्यक्ति है—जहां भावनाओं से अधिक महत्व राष्ट्रीय हितों और दीर्घकालिक कूटनीतिक गणित को दिया जा रहा है।