19 फरवरी को देशभर में छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती मनाई जा रही है। इसी अवसर पर उनके राज्याभिषेक की वह ऐतिहासिक कथा फिर चर्चा में है, जब काशी से आए विद्वान पंडित गागभट्ट ने उन्हें औपचारिक रूप से ‘छत्रपति’ का ताज पहनाने का आग्रह किया था। रायगढ़ किले में 1674 में हुआ वह राजतिलक केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि स्वाभिमान, स्वराज और वैधानिक सत्ता की स्थापना का निर्णायक क्षण था।
औपचारिक राज्याभिषेक के बिना राजा का सम्मान नहीं”
इतिहासकारों के अनुसार, 1674 में काशी से आए विद्वान पंडित गागभट्ट ने शिवाजी को संबोधित करते हुए कहा था कि औपचारिक राज्याभिषेक के बिना शासक को पूर्ण राजकीय सम्मान नहीं मिलता। उन्होंने तर्क दिया कि स्वराज स्थापित करने वाले योद्धा को वैदिक विधि से अभिषिक्त कर ‘छत्रपति’ बनाया जाना चाहिए, ताकि अन्य राजा भी उन्हें वैधानिक रूप से स्वीकार करें। यह उल्लेख 20वीं सदी के इतिहासकार नीलकांत सदाशिव ताकाखाव की पुस्तक The Life of Shivaji Maharaj में मिलता है।
रायगढ़ का ऐतिहासिक राज्याभिषेक
6 जून 1674 को छत्रपति शिवाजी महाराज का भव्य राज्याभिषेक रायगढ़ किले में हुआ। इतिहासकार बताते हैं कि सात पवित्र नदियों—गंगा, यमुना, नर्मदा, सिंधु, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी—का जल स्वर्ण पात्रों में मंगाया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शिवाजी का अभिषेक हुआ। राज्याभिषेक के बाद उन्होंने सबसे पहले अपनी माता जीजाबाई के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया। उस समय लगभग 50 हजार लोग उपस्थित बताए जाते हैं।
गागभट्ट कौन थे?
विकिपीडिया और अन्य ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, पंडित गागभट्ट का मूल नाम विश्वेश्वर पंडित था। वे 17वीं सदी के वाराणसी के प्रतिष्ठित विद्वान थे। उन्होंने शिवाजी का उपनयन संस्कार कराया और वैदिक परंपरा के अनुसार उन्हें ‘छत्रपति’ घोषित किया। गागभट्ट ने यह भी सार्वजनिक रूप से कहा कि शिवाजी का वंश क्षत्रिय परंपरा से जुड़ा है—जो उस समय राजनीतिक वैधता के लिए महत्वपूर्ण था।
इंद्राभिषेक और ‘शककर्ता’ की उपाधि
इतिहासकार गिज्स क्रूइत्जर की पुस्तक Xenophobia in Seventeenth-century India के अनुसार, शिवाजी ने अपने राज्याभिषेक में इंद्राभिषेक अनुष्ठान पर जोर दिया। यह अनुष्ठान 9वीं शताब्दी के बाद प्रचलन से बाहर हो गया था। इस अनुष्ठान के बाद शिवाजी को ‘शककर्ता’ की उपाधि मिली—जिसका अर्थ था एक नए युग की शुरुआत करने वाला शासक। यह केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि मराठा शक्ति के उदय का प्रतीक था।
शिवनेरी किले से जन्म का संबंध
शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 को पुणे जिले के जुन्नार स्थित शिवनेरी किला में हुआ था। शिवनेरी किला मराठा इतिहास का प्रतीक स्थल है। जयंती के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। हालिया समारोह में भारी भीड़ के कारण भगदड़ की सूचना भी सामने आई, जिसमें कई महिलाएं और बच्चे घायल हुए। प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था सख्त करने की घोषणा की है।
शिवनेरी मुगलों के पास कैसे गया?
इतिहास के पन्ने बताते हैं कि 1637 में एक समझौते के तहत शिवनेरी किला मुगलों को सौंप दिया गया। शिवाजी ने 1673 और 1678 में इसे पुनः हासिल करने का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। अंततः 1716 में यह किला मराठा नियंत्रण में आया और शिवाजी के पोते शाहूजी महाराज ने इसे अपने साम्राज्य में शामिल किया।
राज्याभिषेक का राजनीतिक महत्व
इतिहासकारों का मानना है कि शिवाजी का राज्याभिषेक केवल धार्मिक औपचारिकता नहीं था। यह मराठा शक्ति की वैधानिक घोषणा थी—एक ऐसा संदेश कि वे केवल क्षेत्रीय सरदार नहीं, बल्कि सार्वभौम सम्राट हैं। राजतिलक के बाद शिवाजी की स्थिति अन्य राजाओं के समकक्ष मानी जाने लगी।
आज के संदर्भ में महत्व
शिवाजी जयंती केवल ऐतिहासिक स्मरण नहीं, बल्कि नेतृत्व, स्वराज और प्रशासनिक कौशल की प्रेरणा है। आज भी उनका राज्य प्रबंधन मॉडल, किलेबंदी की रणनीति और नौसैनिक शक्ति का विकास अध्ययन का विषय है।