नई दिल्ली। राजनीतिक माहौल के ‘विषाक्त’ होने की दलीलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि देश के नेताओं का कर्तव्य है कि वे भाईचारे और संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा दें। हालांकि, कोर्ट ने राजनीतिक भाषणों पर व्यापक दिशानिर्देश तय करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए इसे निष्पक्ष तरीके से दोबारा दायर करने को कहा।
अदालत की सख़्त टिप्पणी, पर सुनवाई से इनकार
मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक नेताओं की ज़िम्मेदारी सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि समाज में भाईचारा और संवैधानिक नैतिकता को मज़बूत करना भी है। याचिका में मांग की गई थी कि अदालत राजनीतिक भाषणों और उनकी मीडिया रिपोर्टिंग पर कुछ दिशानिर्देश तय करे, ताकि कथित तौर पर भाईचारे और संवैधानिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाने वाले बयानों पर अंकुश लगाया जा सके। मगर CJI की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि याचिका निष्पक्ष और ऑब्जेक्टिव होनी चाहिए—किसी विशेष व्यक्ति या दल को निशाना बनाने वाली याचिकाएं स्वीकार्य नहीं होंगी।
CJI की बेंच का रुख
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अदालत पहले भी राजनीतिक दलों से संयम और संवैधानिक मूल्यों के पालन की अपील कर चुकी है। CJI ने दोहराया, “हम 75 साल पुराने परिपक्व लोकतंत्र हैं। हम वैचारिक मतभेदों के साथ चुनाव लड़ सकते हैं, परंतु आपसी सम्मान बना रहना चाहिए।” पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि याचिका में किसी एक नेता के भाषणों का ही उल्लेख है, तो वह निष्पक्ष चुनौती नहीं मानी जाएगी।
कपिल सिब्बल की दलील और अदालत की प्रतिक्रिया
वरिष्ठ अधिवक्ता Kapil Sibal ने दलील दी कि राजनीतिक माहौल लगातार “विषाक्त” होता जा रहा है। जब भाषण भाईचारे को दूषित करते हैं, तब जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए। सिब्बल ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। हालांकि, बेंच ने संकेत दिया कि याचिका में Himanta Biswa Sarma के भाषणों का उल्लेख होने से यह ‘टारगेटेड’ प्रतीत होती है। अदालत ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता संशोधित और निष्पक्ष याचिका दायर करें।
याचिका की पृष्ठभूमि और कोर्ट का सवाल
यह याचिका शिक्षाविद् रूप रेखा वर्मा सहित 12 लोगों ने दायर की थी। मांग थी कि अदालत मीडिया और राजनेताओं के लिए ऐसे भाषणों के प्रसारण/रिपोर्टिंग को लेकर दिशानिर्देश तय करे, जो कथित रूप से संवैधानिक मूल्यों को प्रभावित करते हैं। लेकिन जस्टिस बीवी नागरत्ना ने एक बुनियादी सवाल उठाया—“अगर हम दिशानिर्देश बना भी दें, तो उनका पालन कौन करवाएगा? विचारों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है?” उन्होंने जोर देकर कहा कि विचारों को संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप विकसित करना समाज और राजनीति दोनों की साझा ज़िम्मेदारी है।
लोकतंत्र की कसौटी: अभिव्यक्ति बनाम ज़िम्मेदारी
यह मामला सिर्फ एक याचिका तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न को सामने लाता है—क्या राजनीतिक भाषणों पर न्यायपालिका द्वारा फ्रेमवर्क तय किया जाना चाहिए? या यह जिम्मेदारी विधायिका, निर्वाचन आयोग और राजनीतिक दलों की आचार संहिताओं के दायरे में आती है? कोर्ट ने संकेत दिया कि वह सिद्धांतगत मुद्दे पर विचार के लिए खुली है, बशर्ते याचिका निष्पक्ष और व्यापक हो। यह रुख बताता है कि अदालत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक बहस के महत्व को भी ध्यान में रखती है।
75 साल का लोकतंत्र और “संवैधानिक नैतिकता”
CJI ने कहा कि देश 75 साल पुराना परिपक्व लोकतंत्र है, और ऐसे व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जाती जो आपसी सम्मान को चोट पहुंचाए। उन्होंने सभी दलों से अपील की कि संवैधानिक मूल्यों—बंधुत्व, समानता, गरिमा और आत्मसम्मान—का पालन करें। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब राजनीतिक बयानों और उनके असर पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है। अदालत की यह “नसीहत” राजनीतिक नेतृत्व के लिए स्पष्ट संदेश मानी जा रही है।