बरेली के मोहम्मदगंज गांव में एक निजी घर में जुमे की नमाज को लेकर शुरू हुआ विवाद अब बड़ा कानूनी मुद्दा बन गया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के डीएम और एसएसपी अनुराग आर्य को अवमानना नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने अपने पुराने फैसले का हवाला देते हुए निजी परिसरों में प्रार्थना के अधिकार पर स्पष्ट रुख दोहराया है। उधर गांव में कुछ घरों पर ‘मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर लगने के बाद माहौल और संवेदनशील हो गया है।
नमाज पर रोक और हाईकोर्ट की सख्ती
बरेली के मोहम्मदगंज गांव में 16 जनवरी 2026 को एक निजी घर में पढ़ी जा रही सामूहिक जुमे की नमाज को लेकर उठे विवाद ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली के डीएम और एसएसपी अनुराग आर्य को अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूछा है कि पूर्व में दिए गए आदेश के बावजूद निजी परिसर में धार्मिक प्रार्थना को क्यों रोका गया।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने 12 फरवरी को सुनवाई के दौरान यह कार्रवाई शुरू की। साथ ही, याचिकाकर्ता तारिक खान के खिलाफ किसी भी प्रकार की जबरदस्ती की कार्रवाई पर रोक लगा दी गई है। अगली सुनवाई 11 मार्च को निर्धारित की गई है।
क्या है पूरा मामला?
बताया जा रहा है कि 16 जनवरी को गांव के एक खाली निजी मकान में मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग जुमे की नमाज अदा कर रहे थे। मकान की मालकिन रेशमा खान ने इसकी अनुमति दी थी। नमाज पूरी तरह निजी परिसर के अंदर हो रही थी। हालांकि, गांव के कुछ हिंदू परिवारों ने आपत्ति जताई और पुलिस से शिकायत की। इसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची और नमाज को रोक दिया गया। बाद में संबंधित लोगों को छोड़ दिया गया, लेकिन विवाद बढ़ गया।
हाईकोर्ट के पुराने फैसले का हवाला
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में दायर याचिका में एक पुराने फैसले का हवाला दिया। यह फैसला ‘मरनाथ फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में आया था। उस निर्णय में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि निजी संपत्ति के अंदर प्रार्थना करने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, बशर्ते कार्यक्रम सार्वजनिक स्थान पर न फैले। कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि प्रार्थना सभा से सार्वजनिक शांति या यातायात प्रभावित होता है, तो आयोजकों को प्रशासन को सूचित करना होगा और आवश्यक अनुमति लेनी होगी। याचिकाकर्ता तारिक खान का कहना है कि जब ईसाई समुदाय को निजी परिसर में प्रार्थना की छूट दी गई थी, तो वही सिद्धांत मुस्लिम समुदाय पर भी लागू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम संवैधानिक अधिकार के तहत अपने निजी परिसर में नमाज पढ़ रहे हैं।
गांव में बढ़ता तनाव
कोर्ट के आदेश के बाद नमाज फिर से उसी घर में शुरू हो गई है। इससे गांव का माहौल संवेदनशील बना हुआ है। मोहम्मदगंज गांव में लगभग 100 घर और करीब 600 लोग रहते हैं। यहां दोनों समुदायों के लोग वर्षों से साथ रह रहे हैं। कुछ हिंदू परिवारों ने घरों की दीवारों पर ‘मकान बिकाऊ है’ के पोस्टर लगा दिए हैं। उनका आरोप है कि अलग-अलग घरों में जुमे की नमाज पढ़ी जा रही है और भविष्य में आवासीय इलाके को स्थायी पूजा स्थल में बदला जा सकता है। इन परिवारों ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है और ज्ञापन भी सौंपा है।
प्रशासन का पक्ष
एसएसपी अनुराग आर्य ने स्पष्ट किया है कि गांव में हालात नियंत्रण में हैं। किसी भी प्रकार की जबरदस्ती की कार्रवाई नहीं की गई। उनका कहना है कि प्रशासन का उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी आवासीय संपत्ति बिना वैधानिक प्रक्रिया के सार्वजनिक धार्मिक स्थल में परिवर्तित न हो। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाता है, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
कानूनी और सामाजिक संतुलन का सवाल
यह मामला केवल एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन का संवेदनशील प्रश्न बन गया है। संविधान नागरिकों को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने का अधिकार देता है, लेकिन साथ ही सार्वजनिक शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य पर होती है। अब सबकी निगाहें 11 मार्च की सुनवाई पर टिकी हैं, जब हाईकोर्ट यह तय करेगा कि प्रशासन की कार्रवाई अवमानना की श्रेणी में आती है या नहीं।