नई दिल्ली। एक 10 महीने का मासूम पिता के बिना पल रहा है, एक जोड़ा जिसने सालभर छिपकर जिंदगी काटी और एक युवक जिसने साढ़े पांच साल सलाखों के पीछे गुजारे—इन तीनों की कहानी एक कानून की कठोर व्याख्या से जुड़ी है। बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बना POCSO एक्ट आज सहमति से बने किशोर प्रेम संबंधों पर भी भारी पड़ता दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अब ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ पर विचार का संकेत देकर इस बहस को नया मोड़ दे दिया है।
आंकड़े जो चौंकाते हैं
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2023 में POCSO के तहत दर्ज 40,846 मामलों में से 52% पीड़िताएं 16-18 वर्ष आयु वर्ग की थीं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इन मामलों में बड़ी संख्या ऐसे रिश्तों की है जो आपसी सहमति पर आधारित थे, लेकिन कानून में सहमति की कोई गुंजाइश नहीं।
भागकर शादी, फिर 10 साल की कानूनी जंग
श्वेता और रमेश की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। मोहल्ले की दोस्ती प्यार में बदली। परिवार को ऐतराज हुआ। दिसंबर 2015 में जब श्वेता के घरवालों ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी, तो उसने घर छोड़ दिया। दोनों ने मंदिर में शादी की, लेकिन श्वेता 18 वर्ष से कुछ हफ्ते छोटी थी। यही ‘गलती’ उनकी जिंदगी पर भारी पड़ी। पुलिस की तलाश, एक साल तक लुका-छिपी, फिर सरेंडर। केस चलता रहा—पेशियां, वकील, खर्च और बदनामी। आखिर 2025 में कोर्ट ने गवाही के आधार पर मामला खारिज किया। आज उनके दो बच्चे हैं, मगर श्वेता कहती है—“अगर कानून की सख्ती पता होती, तो शायद मैं घर से नहीं भागती।”
छिपी प्रेग्नेंसी और जेल में बॉयफ्रेंड
अंजना 16 साल की थी। पड़ोस में रहने वाले लड़के से दोस्ती हुई, जो धीरे-धीरे रिश्ते में बदल गई। वह प्रेग्नेंट हो गई, मगर डर के कारण परिवार को नहीं बताया। अप्रैल की एक रात उसने अकेले बच्चे को जन्म दिया। अस्पताल को कम उम्र की प्रेग्नेंसी की सूचना पुलिस को देनी पड़ी। FIR दर्ज हुई, और लड़का जेल चला गया। बेल की कोशिशें नाकाम रहीं। आखिर 9 महीने बाद अंजना ने कोर्ट में बयान दिया कि रिश्ता सहमति से था। बेल मिली, लेकिन केस अभी भी चल रहा है। 10 महीने का बच्चा अनिश्चित भविष्य के साए में बड़ा हो रहा है।
पांच साल तिहाड़ में… प्यार का अंजाम
मदन और पूजा एक साल से रिश्ते में थे। 2020 में पूजा घर से चली गई। उम्र 17 साल थी। परिवार ने किडनैपिंग और रेप का आरोप लगा दिया। FIR दर्ज होते ही मदन गिरफ्तार हो गया। मदन ने बताया कि तिहाड़ जेल की बैरक में उसे कई ऐसे युवक मिले जो सहमति वाले रिश्तों के बावजूद 15-20 साल की सजा काट रहे थे। नवंबर 2025 में पूजा के बयान के बाद मदन बरी हुआ। साढ़े पांच साल जेल में बिताकर बाहर आया युवक आज भी डर के साये में जी रहा है।
‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ क्यों जरूरी?
कानून विशेषज्ञों का तर्क है कि POCSO एक्ट बच्चों को शोषण से बचाने के लिए बना था, लेकिन किशोर-प्रेम मामलों में इसकी सख्ती कई बार संतुलन बिगाड़ देती है। ‘रोमियो-जूलियट क्लॉज’ का प्रस्ताव कहता है कि यदि दोनों की उम्र 16-18 वर्ष के बीच हो, उम्र का अंतर सीमित हो और रिश्ता सहमति से हो, तो कठोर धाराएं लागू न की जाएं। अमेरिका और कुछ अन्य देशों में ऐसे प्रावधान पहले से हैं।
कानून बनाम सामाजिक मानसिकता
विशेषज्ञ मानते हैं कि कई मामलों में परिवार की ‘इज्जत’ का सवाल पुलिस केस में बदल जाता है। परिणाम—जेल, मुकदमा, बदनामी और बरसों की पीड़ा। दिल्ली के एक सरकारी वकील का कहना है, “कई बार हमें पता होता है कि मामला सहमति का है, लेकिन कानून में विकल्प नहीं होने से केस चलाना पड़ता है।”
अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने उम्मीद जगाई है कि कानून में संतुलन लाने पर बहस गंभीर होगी। सवाल सिर्फ कानूनी नहीं, सामाजिक भी है—क्या किशोरों की भावनाओं को समझते हुए उन्हें सुधार और परामर्श का मौका दिया जाना चाहिए, या हर रिश्ता सलाखों के पीछे खत्म होगा? जब तक कानून में स्पष्टता नहीं आती, तब तक न जाने कितने ‘रोमियो’ जेल में और कितनी ‘जूलियट’ अदालतों के चक्कर लगाती रहेंगी।