नई दिल्ली। देश की शीर्ष अदालत में एक बार फिर न्यायिक विचारधारा को लेकर बड़ा विमर्श खड़ा हो गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने 2023 में प्रकाशित सुप्रीम कोर्ट की चर्चित जेंडर हैंडबुक पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे लगभग खारिज कर दिया। यह वही दस्तावेज है जिसे पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका को जेंडर संवेदनशील बनाने के उद्देश्य से जारी किया था।
‘हार्वर्ड-केंद्रित’ और ‘बहुत तकनीकी’ – CJI की कड़ी टिप्पणी
पीठ ने टिप्पणी की कि यह हैंडबुक जरूरत से ज्यादा तकनीकी और विदेशी अकादमिक सोच से प्रभावित है। CJI सूर्यकांत ने साफ कहा – “रेप पीड़िता, उसका परिवार या आम आदमी इस भाषा को नहीं समझ सकता।” यह बयान सीधे उस पहल पर सवाल था जिसे न्यायपालिका में सुधार का महत्वपूर्ण कदम माना गया था। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एनवी अंजारी भी शामिल थे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से उठा विवाद
पूरा मामला उस समय गरमाया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में कहा था कि ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ और ‘पायजामे की डोरी ढीली करना’ रेप के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। इस फैसले पर देशभर में आक्रोश फैल गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस आदेश पर रोक लगा दी थी। अब CJI सूर्यकांत की पीठ ने 17 मार्च 2025 का वह फैसला रद्द कर दिया और निचली अदालत को दोनों आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई आगे बढ़ाने का आदेश दिया।
क्या है ‘Handbook on Combating Gender Stereotypes’?
अगस्त 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी अदालतों के लिए यह हैंडबुक जारी की थी। इसका उद्देश्य जजों और वकीलों को जेंडर आधारित रूढ़ियों से बचाने के लिए संवेदनशील भाषा के प्रयोग की सलाह देना था।
इसमें प्रमुख बिंदु थे:
- महिलाओं पर झूठे रेप केस के आरोप की धारणा को चुनौती
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ यौन हिंसा को स्वीकार करना
- महिलाओं की तार्किक क्षमता पर सवाल उठाने वाली सोच का खंडन
घरेलू कार्यों को महिलाओं तक सीमित करने की मानसिकता का विरोध पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने प्रस्तावना में लिखा था कि यह दस्तावेज अतीत के फैसलों की आलोचना नहीं बल्कि न्यायिक भाषा को बेहतर बनाने का प्रयास है।
CJI सूर्यकांत का नया रुख: ‘उपदेश नहीं, ट्रेनिंग’
CJI सूर्यकांत ने कहा – “सुप्रीम कोर्ट में बैठे हाईकोर्ट जजों को उपदेश देने से लाभ नहीं। उन्हें अकादमी में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए।” पीठ ने भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया कि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की समिति बनाकर नई गाइडलाइन तैयार करे। एमिकस क्यूरी शोभा गुप्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फूलका सहित अन्य विशेषज्ञों की सहायता लेने को भी कहा गया।
बड़ा सवाल: सुधार या टकराव?
यह विवाद केवल एक हैंडबुक पर असहमति नहीं है। यह न्यायपालिका के भीतर विचारधारा, भाषा और दृष्टिकोण को लेकर उभरती बहस का संकेत देता है। एक पक्ष मानता है कि जेंडर सेंसिटिव भाषा अत्यंत जरूरी है।
दूसरा पक्ष कहता है कि सुधार व्यावहारिक होना चाहिए, ना कि ‘अत्यधिक अकादमिक’।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
यह मामला केवल अदालत के भीतर सीमित नहीं रहेगा।
- महिला अधिकार समूह प्रतिक्रिया दे सकते हैं
- विधि विशेषज्ञों के बीच बहस तेज होगी
- जेंडर विमर्श पर राष्ट्रीय चर्चा संभव
न्यायपालिका के इतिहास में यह एक अहम मोड़ माना जा सकता है जहाँ न्यायिक भाषा और प्रशिक्षण मॉडल पुनः समीक्षा के दौर में है।