नई दिल्ली। रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर अमेरिका का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों के बीच सवाल यह है कि क्या भारत रूसी तेल का आयात पूरी तरह बंद करेगा या अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देगा। जानकारों का कहना है कि रूस से मिलने वाला भारी डिस्काउंट, रिफाइनरी अनुकूलता और महंगाई पर पड़ने वाला असर—इन सबके चलते रूसी तेल को अचानक छोड़ना भारत के लिए आसान नहीं, बल्कि बेहद महंगा सौदा साबित हो सकता है।
भारत की ऊर्जा नीति इस वक्त केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, रणनीतिक और कूटनीतिक परीक्षा से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया का ऊर्जा संतुलन बदला है, लेकिन भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप फैसले लेकर अब तक खुद को संभाले रखा। अब हालात एक बार फिर कठिन हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और रिपब्लिकन उम्मीदवार Donald Trump ने भारत को खुली चेतावनी दी है—रूसी तेल खरीद बंद करो, वरना 25% से लेकर 500% तक टैरिफ झेलने को तैयार रहो। यह बयान ऐसे समय आया है, जब India अपनी कुल तेल जरूरत का करीब 85% आयात करता है और इसमें रूसी हिस्सेदारी लंबे समय तक रीढ़ बनी रही है।
क्या भारत रूसी तेल पूरी तरह बंद कर देगा?
ऊर्जा विशेषज्ञों और वैश्विक बाजार विश्लेषकों की मानें तो इसकी संभावना बेहद कम है। कुछ कटौती जरूर हो सकती है—और इसके संकेत मिलने भी लगे हैं—लेकिन पूरी तरह आयात रोकना भारत के लिए आर्थिक आत्मघात जैसा होगा। तेल बाजार पर नज़र रखने वाली वेबसाइट OilPrice और वैश्विक एजेंसी Reuters की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत ने वैकल्पिक सप्लाई खोजनी शुरू कर दी है। सरकारी रिफाइनरी कंपनियां IOC और HPCL ने Venezuela से तेल मंगाना शुरू किया है। वहीं रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने रूस से खरीद फिलहाल रोककर वेनेजुएला से एक बड़ा क्रूड शिपमेंट लिया है।
फिर भी रूस क्यों है भारत के लिए अहम?
कारण सिर्फ राजनीतिक नहीं, तकनीकी और आर्थिक भी हैं। रूस जो ‘यूराल ग्रेड’ कच्चा तेल भारत को देता है, वह भारी और सल्फर-युक्त होता है। भारत की कई रिफाइनरियां—खासकर गुजरात और महाराष्ट्र में—इसी ग्रेड के हिसाब से डिजाइन की गई हैं। इसके मुकाबले अमेरिका का शेल ऑयल हल्का और गैस कंडेनसेट जैसा होता है। इसका मतलब यह हुआ कि अमेरिकी तेल का इस्तेमाल करने के लिए भारतीय रिफाइनरियों को:
- दूसरे ग्रेड के तेल के साथ मिश्रण करना होगा
- अतिरिक्त प्रोसेसिंग कॉस्ट झेलनी होगी
- रिफाइनिंग मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा
यानी, एक तेल छोड़कर दूसरा लेना प्लग-एंड-प्ले नहीं है।
डिस्काउंट का गणित: रूस क्यों सस्ता पड़ता है?
रूस ने भारत को कच्चे तेल पर बड़ा डिस्काउंट दिया है।
- पहले यह छूट: 7–8 डॉलर प्रति बैरल
- अब बढ़कर: 11 डॉलर प्रति बैरल तक
ऐसे में सालाना करोड़ों बैरल आयात करने वाले भारत के लिए यह हजारों करोड़ रुपये की बचत बनती है। अगर भारत यह सस्ता तेल छोड़ता है, तो सीधा असर:
- पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों पर
- महंगाई पर
- चालू खाते के घाटे पर
- देखा जाएगा।
- अमेरिकी तेल कितना महंगा?
The Wall Street Journal की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी कच्चा तेल भारतीय खरीदारों के लिए कई वजहों से महंगा है:
लॉन्ग डिस्टेंस शिपिंग: अमेरिका के खाड़ी तट से भारत तक ज्यादा समय और ईंधन
- फ्रेट कॉस्ट अधिक
- सप्लाई चेन जोखिम
एनर्जी डेटा फर्म Vortexa के मुताबिक इस बदलाव से भारतीय रिफाइनरियों को प्रति बैरल 7 डॉलर तक अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है। डेटा एनालिटिक्स कंपनी Kpler के एक विश्लेषक का कहना है- “तकनीकी रूप से भारतीय रिफाइनरियां यूराल तेल के बिना काम कर सकती हैं, लेकिन तेजी से रूसी तेल छोड़ना व्यावसायिक रूप से नुकसानदायक और राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील होगा।”
ट्रंप की धमकी और टैरिफ का डर
डोनाल्ड ट्रंप पहले भी रूस के बड़े तेल निर्यातकों पर सख्त प्रतिबंध लगा चुके हैं। नवंबर में उन्होंने न सिर्फ बैन लगाया, बल्कि भारत जैसे देशों को 500% तक टैरिफ की चेतावनी भी दी थी। यही वजह है कि भारत ने तब से रूसी तेल पर कुछ हद तक ब्रेक लगाया। अब सवाल यह है—
- क्या भारत अमेरिकी दबाव में झुकेगा?
- या फिर रणनीतिक स्वायत्तता पर कायम रहेगा?
- रूस की प्रतिक्रिया: कोई घबराहट नहीं
रूस इस पूरे घटनाक्रम से फिलहाल असहज नहीं दिख रहा। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने साफ कहा कि भारत अकेला ग्राहक नहीं है और उसने हमेशा बहु-स्रोत नीति अपनाई है। उनके शब्दों में- भारत हमेशा से अलग-अलग देशों से ऊर्जा उत्पाद खरीदता रहा है। इसमें हमें कुछ नया नहीं दिखता।” यह बयान बताता है कि रूस भी मानकर चल रहा है कि पूर्ण ब्रेक नहीं लगेगा, सिर्फ रफ्तार कम हो सकती है।