मेरठ। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मेरठ में प्रस्तावित कार्यक्रम के लिए जारी टेंडर की रकम ने नई बहस छेड़ दी है। कार्यक्रम की व्यवस्थाओं और भोजन के लिए कुल 1 करोड़ 53 लाख 80 हजार रुपये की अनुमानित लागत रखी गई थी। इनमें करीब 1.14 करोड़ रुपये टेंटेज, ब्रांडिंग, ऑडियो-विजुअल और दूसरी व्यवस्थाओं, जबकि 39.04 लाख रुपये भोजन के लिए निर्धारित किए गए थे। अब कार्यक्रम स्थगित होने के बाद सवाल और तेज हो गए हैं कि इतनी बड़ी अनुमानित लागत आखिर किन जरूरतों और दरों के आधार पर तय की गई थी।
मेरठ के जिला निर्वाचन अधिकारी की ओर से जारी टेंडर में कार्यक्रम से जुड़ी व्यवस्थाओं के लिए 1 करोड़ 14 लाख 76 हजार रुपये की अनुमानित लागत रखी गई। इसमें टेंटेज, मंडप, ब्रांडिंग, फर्नीचर, ऑडियो-विजुअल सिस्टम, फ्लोरिंग, लाइटिंग, जनरेटर और अन्य व्यवस्थाएं शामिल थीं। इस काम के लिए पांच दिन की अवधि निर्धारित की गई थी। टेंडर की रकम सामने आने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा इसी मद को लेकर हो रही है कि आयोजन संबंधी व्यवस्थाओं का अनुमान एक करोड़ रुपये से भी अधिक कैसे पहुंचा।
खाने के लिए अलग से 39.04 लाख का टेंडर
दूसरी निविदा भोजन एवं उससे संबंधित व्यवस्थाओं के लिए थी। इसकी अनुमानित लागत 39 लाख चार हजार रुपये रखी गई और काम की अवधि एक दिन बताई गई। दोनों निविदाओं की अनुमानित रकम को जोड़ें तो कुल आंकड़ा 1 करोड़ 53 लाख 80 हजार रुपये बैठता है। प्रकाशित रिपोर्टों में भी मेरठ के प्रस्तावित कार्यक्रम के लिए यही बजट सामने आया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को 25 सितंबर को मेरठ में युवाओं के साथ संवाद करना था। निर्वाचक साक्षरता क्लब (ELC 2.0) और ECI-Net से जुड़े कार्यक्रम में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों और शिक्षकों की भागीदारी प्रस्तावित थी। बाद में मेरठ का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। निर्वाचन आयोग की ओर से सामने आई प्रतिक्रिया में कार्यक्रम की तारीख में बदलाव को सामान्य प्रक्रिया बताया गया और कहा गया कि विभिन्न कारणों से कार्यक्रमों की तारीखें बदलती रहती हैं।
पूर्व DGP भी मैदान में, सोशल मीडिया पर उठाए सवाल
टेंडर की रकम सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गई है। एक पूर्व पुलिस महानिदेशक ने अपने फेसबुक अकाउंट के जरिये इस खर्च को लेकर सवाल उठाए हैं। उनकी पोस्ट के बाद मामला प्रशासनिक दायरे से निकलकर सोशल मीडिया की बहस का हिस्सा भी बन गया है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि टेंडर में दर्ज ₹1.53 करोड़ की रकम अनुमानित लागत है, इसे वास्तविक भुगतान नहीं माना जा सकता। किस एजेंसी ने कितनी दर पर टेंडर हासिल किया, कार्यक्रम स्थगित होने से पहले कौन-कौन से काम कराए गए, कितनी सामग्री लगाई गई और अंततः सरकारी खजाने से कितना भुगतान हुआ, इन सवालों का जवाब संबंधित वर्क ऑर्डर, बिल और भुगतान रिकॉर्ड से ही मिलेगा। यही वजह है कि केवल बड़ी अनुमानित लागत के आधार पर भ्रष्टाचार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।