बरेली। तारीख पर तारीख मिलती रही और देखते ही देखते जिंदगी के 29 साल गुजर गए। जवानी में ठगी के आरोप में जेल जाने वाले दो दोस्तों को आखिरकार बुढ़ापे की दहलीज पर न्याय मिला। गुरुवार को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) त्वरित न्यायालय की न्यायाधीश अंकिता चौधरी ने साक्ष्यों के अभाव में दोनों को दोषमुक्त कर दिया। फैसला सुनते ही दोनों ने राहत की सांस ली। हालांकि, उन्हें इस बात का मलाल है कि एक मुकदमे ने उनके जीवन के 29 साल छीन लिए और सेना में भर्ती होने का सपना भी अधूरा रह गया।
मामला दो जुलाई 1997 का है। नकटिया निवासी विक्रम सिंह उस समय बरेली कॉलेज में बीए प्रथम वर्ष के छात्र थे। वह अपने दोस्त गोपालकृष्ण शर्मा के साथ स्कूटर से मनोरंजन सदन की ओर जा रहे थे। रास्ते में पुलिस चेकिंग के दौरान दोनों को रोक लिया गया। तलाशी लेने के बाद पुलिस उन्हें कोतवाली ले गई। पुलिस ने आरोप लगाया कि दोनों युवक 50-50 रुपये के नोटों के बीच सफेद कागज लगाकर राहगीरों से ठगी करते थे। इसी आरोप में मुकदमा दर्ज कर दोनों को जेल भेज दिया गया। बाद में पुलिस ने आरोपपत्र भी दाखिल कर दिया। कुछ समय बाद दोनों को जमानत मिल गई, लेकिन समाज में उन पर लगा ठगी का दाग नहीं मिट सका।
29 साल तक कोर्ट के चक्कर काटते रहे दोनों दोस्त
जमानत मिलने के बाद दोनों दोस्तों की जिंदगी अदालत की तारीखों के बीच उलझकर रह गई। मुकदमे की हर सुनवाई पर दोनों अदालत पहुंचते रहे। उनके अधिवक्ता राहुल उपाध्याय के मुताबिक, अदालत की ओर से कई अवसर दिए जाने के बावजूद पुलिसकर्मी गवाही देने नहीं पहुंचे। अभियोजन पक्ष आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं कर सका। कुछ समय पहले मामले को त्वरित न्यायालय में स्थानांतरित किया गया। गुरुवार को न्यायाधीश अंकिता चौधरी ने सुनवाई के बाद दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया।
सेना में जाने का सपना टूटा, जिंदगी की राह बदल गई
अब विक्रम सिंह की उम्र 53 वर्ष और गोपालकृष्ण शर्मा की 55 वर्ष हो चुकी है। अदालत से बाहर निकलते समय दोनों के चेहरे पर राहत के साथ बीते वर्षों का दर्द भी साफ झलक रहा था। दोनों ने बताया कि युवावस्था में उनका सपना सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का था। इसके लिए वे सुबह दौड़ लगाते और शारीरिक तैयारी करते थे, लेकिन ठगी के मुकदमे ने उनके सपनों पर पानी फेर दिया। मुकदमे के बाद परिस्थितियां ऐसी बदलीं कि विक्रम सिंह को जीवनयापन के लिए वाहन चालक बनना पड़ा, जबकि गोपालकृष्ण शर्मा एक फर्म में नौकरी करने लगे।
बेगुनाही साबित हुई, लेकिन बीते 29 साल कौन लौटाएगा
दोनों दोस्तों का कहना है कि जिस उम्र में भविष्य संवारने की तैयारी कर रहे थे, उसी उम्र में उन पर ठगी का आरोप लग गया। परिवार और समाज के सामने अपनी बेगुनाही साबित करना सबसे बड़ी चुनौती बन गया था। अब अदालत से दोषमुक्त होने के बाद दोनों को इस बात का सुकून है कि वे अपने परिवार और समाज के सामने सिर उठाकर खड़े हो सकेंगे। हालांकि, उनके मन में एक सवाल अब भी है कि जिस मुकदमे ने उनकी जवानी और सपने छीन लिए, जिंदगी के वे 29 साल आखिर कौन लौटाएगा।