बरेली। बरेली में चल रही अग्निवीर भर्ती के बीच बड़ा खेल पकड़ा गया है। फिजिकल, मापतौल और मेडिकल में पास कराने की गारंटी देकर अभ्यर्थियों से रुपये ऐंठे जा रहे थे। किसी को सेना का अफसर बताकर सामने लाया जाता तो कोई मिलिट्री अस्पताल में अपनी मजबूत पकड़ होने का दावा करता। कैंट पुलिस और मिलिट्री इंटेलिजेंस ने इस कथित नेटवर्क के पांच लोगों को हरभजन गेट के पास से दबोच लिया।
पकड़े गए लोगों के मोबाइल खंगाले गए तो पुलिस भी चौंक गई। फोन में अभ्यर्थियों से हुई व्हाट्सएप चैट, मेडिकल से जुड़े दस्तावेज, प्रवेश पत्रों के स्क्रीनशॉट और ऑनलाइन लेनदेन के रिकॉर्ड मिले हैं। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े दूसरे लोगों तक पहुंचने में जुटी है।
हरभजन गेट के पास चल रहा था पास कराने का दावा
मिलिट्री इंटेलिजेंस को 23 सितंबर को भनक लगी कि जाट रेजीमेंट सेंटर में चल रही अग्निवीर भर्ती के आसपास कुछ लोग सक्रिय हैं। ये लोग ऐसे अभ्यर्थियों को निशाना बना रहे हैं, जिन्हें मापतौल या मेडिकल में बाहर होने का डर है। दावा किया जा रहा था कि रुपये खर्च करने पर भर्ती की बाधा दूर करा दी जाएगी। इनपुट मिलते ही कैंट पुलिस और मिलिट्री इंटेलिजेंस की टीम हरभजन गेट पहुंच गई। यहां पांच संदिग्ध बातचीत करते मिले। टीम ने घेराबंदी कर पांचों को पकड़ लिया।
डिफेंस एकेडमी से तलाशे जाते थे टारगेट
पकड़े गए लोगों में बदायूं के इस्लामनगर क्षेत्र का प्रदीप कुमार शर्मा भी शामिल है। पुलिस के मुताबिक प्रदीप चौबारी में दीक्षित डिफेंस एकेडमी चलाता है और अग्निवीर भर्ती की तैयारी करने वाले युवाओं को फिजिकल ट्रेनिंग देता है। आरोप है कि यहीं से ऐसे अभ्यर्थियों की पहचान की जाती थी, जिन्हें अपनी लंबाई, मापतौल या मेडिकल को लेकर डर रहता था। फिर उन्हें भरोसा दिलाया जाता कि भर्ती में अंदर तक पहुंच है और उनका काम कराया जा सकता है।
पुराने कागज दिखाकर जमाते थे भरोसा
अभ्यर्थी आसानी से जाल में न फंसें, इसके लिए उन्हें पुराने भर्ती परिणाम और मेडिकल में अनफिट होने से जुड़े दस्तावेज दिखाए जाते थे। पुलिस के मुताबिक इन्हीं दस्तावेजों के सहारे यह भरोसा दिलाने की कोशिश होती थी कि पहले भी अभ्यर्थियों को मेडिकल में फिट कराया जा चुका है। युवक जब भरोसे में आ जाते तो उनसे रुपये लिए जाते। पुलिस अब मोबाइल में मिले लेनदेन के रिकॉर्ड खंगालकर पता लगा रही है कि कितने अभ्यर्थियों से रकम ली गई।
डेढ़ साल मेडिकल कोर में किया काम, फिर उसी नाम का इस्तेमाल
विशाल यादव ने पूछताछ में बताया कि वह लखनऊ सेंटर में मेडिकल कोर में करीब डेढ़ साल सफाईकर्मी के रूप में काम कर चुका है। पुलिस का आरोप है कि इसी पुराने जुड़ाव का हवाला देकर वह अभ्यर्थियों के सामने अपनी मजबूत पहुंच होने का प्रभाव बनाता था। इसके बाद विशाल ने अपने रिश्तेदार राजवीर उर्फ कैलाश को साथ जोड़ा। फिर धर्मेंद्र सिंह और नूर अहमद भी कथित नेटवर्क का हिस्सा बने।
कोई सेना का अफसर, कोई अस्पताल का कारपेंटर
इस पूरे खेल में सबसे अहम हथियार कथित पहचान थी। पुलिस के मुताबिक नूर अहमद खुद को मिलिट्री अस्पताल में कारपेंटर बताता और दावा करता था कि उसकी अधिकारियों से अच्छी पहचान है। इसी पहचान के बूते अभ्यर्थियों को भर्ती कराने का भरोसा दिया जाता था। पूछताछ में अमरोहा के धनौरा निवासी आसिफ का नाम भी सामने आया है। आरोप है कि अभ्यर्थियों के सामने आसिफ को सेना का अधिकारी बताकर पेश किया जाता था। पुलिस का कहना है कि जांच में सेना के अधिकारियों या मिलिट्री अस्पताल के डॉक्टरों से आरोपियों की ऐसी कोई पहुंच सामने नहीं आई।
चयन अपने दम पर हुआ, तब भी लेते थे काम कराने के रुपये
पुलिस पूछताछ में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई। आरोपियों ने बताया कि किसी अभ्यर्थी का चयन सामान्य भर्ती प्रक्रिया में अपने आप हो जाता था तो भी उसे यही अहसास कराया जाता कि उसका चयन उनकी सेटिंग से हुआ है। इसके बाद उससे रुपये लिए जाते और रकम आपस में बांट ली जाती थी। यानी अभ्यर्थी का कोई काम कराए बिना भी उसके चयन का श्रेय लेकर कमाई करने का खेल चल रहा था।
मोबाइल खोलेगा कितने अभ्यर्थियों से हुई वसूली
पुलिस ने आरोपियों के मोबाइल फोन खंगाले तो धर्मेंद्र, राजवीर और विशाल के फोन में अग्निवीर भर्ती को लेकर व्हाट्सएप चैट और ऑनलाइन लेनदेन के रिकॉर्ड मिले। विशाल के मोबाइल में अभ्यर्थियों के आरएमडीएस नंबर, मेडिकल में पहले अनफिट हुए अभ्यर्थियों को फिट कराने को लेकर बातचीत, मेडिकल डिसेबिलिटी से जुड़े दस्तावेज और प्रवेश पत्रों के स्क्रीनशॉट भी मिले हैं। पुलिस ने प्रदीप कुमार शर्मा, विशाल यादव, राजवीर उर्फ कैलाश, धर्मेंद्र सिंह और नूर अहमद को गिरफ्तार किया है। इनके पास से एक मोटरसाइकिल, एक स्कूटी, छह मोबाइल फोन और 9,100 रुपये बरामद हुए हैं। अब मोबाइल चैट और लेनदेन की कड़ियों के जरिए इस नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों की भूमिका खंगाली जा रही है।