नई दिल्ली/चेन्नई। तमिलनाडु की सियासत में एक ऐतिहासिक मोड़ आता दिख रहा है। फिल्मी दुनिया के सुपरस्टार से नेता बने Vijay Thalapathy अब राजनीति के मैदान में भी ‘ब्लॉकबस्टर’ हिट साबित होते नजर आ रहे हैं। 2026 विधानसभा चुनाव के रुझानों में उनकी पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (टीवीके) को बहुमत मिलता दिख रहा है, जिससे यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि तमिलनाडु को नया ‘थलपति’ मिल सकता है। 234 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है, जबकि शुरुआती रुझानों में टीवीके 100 से ज्यादा सीटों पर बढ़त बनाकर सत्ता के बेहद करीब पहुंच गई है। अगर ये रुझान नतीजों में तब्दील होते हैं, तो यह दक्षिण भारत की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर माना जाएगा।
‘कमांडर’ से ‘सीएम फेस’ तक: थलपति की राजनीति में तेज चढ़ाई
‘थलपति’ शब्द का मतलब ही होता है—कमांडर या जननेता। और विजय ने इस उपाधि को सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि राजनीति में भी इसे चरितार्थ कर दिया। राजनीति में उनकी एंट्री को पहले ‘स्टार पावर’ का प्रयोग माना जा रहा था, लेकिन अब यह साफ हो गया है कि उन्होंने अपनी लोकप्रियता को वोट में बदलने की कला सीख ली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह वही मॉडल है, जो Arvind Kejriwal ने 2013 में दिल्ली में अपनाया था—सीधे जनता से जुड़ाव, सिस्टम के खिलाफ संदेश और नई उम्मीद की राजनीति।
तमिलनाडु की राजनीति में ‘नई लहर’: टीवीके बनी सत्ता की धुरी
तमिलनाडु की राजनीति दशकों से द्रविड़ पार्टियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन इस बार तस्वीर बदलती दिख रही है। टीवीके ने न सिर्फ पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई, बल्कि खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया। रुझानों में पार्टी का 100+ सीटों तक पहुंचना यह दिखाता है कि जनता ने बदलाव का मन बना लिया है। अब सवाल यह नहीं कि टीवीके ताकत बनेगी या नहीं, बल्कि यह है कि वह सत्ता में कैसे और कब प्रवेश करेगी।
युवा और शहरी वोटरों का ‘थलपति’ पर भरोसा
इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत रही—युवा मतदाताओं का रुझान। शहरी क्षेत्रों और पहली बार वोट देने वाले युवाओं ने विजय पर जमकर भरोसा जताया। उनकी सभाओं में उमड़ी भीड़ और सोशल मीडिया पर दिखा जबरदस्त समर्थन, अब वोट में बदलता नजर आ रहा है। युवाओं को विजय में एक ऐसा चेहरा दिखा, जो सिस्टम को बदलने का दावा करता है और नई सोच के साथ आगे बढ़ता है।
केजरीवाल की लीग में एंट्री, लेकिन रास्ता ज्यादा मुश्किल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय की तुलना Arvind Kejriwal से की जा सकती है, लेकिन उनका सफर ज्यादा कठिन रहा है। दिल्ली में जहां केजरीवाल को भ्रष्टाचार विरोधी लहर का फायदा मिला था, वहीं तमिलनाडु में विजय को मजबूत द्रविड़ राजनीति, पुराने पार्टी ढांचे और गहरी जमी राजनीतिक वफादारी से मुकाबला करना पड़ा। इसके बावजूद उनका उभार यह दिखाता है कि जनता अब नए विकल्पों को मौका देने के लिए तैयार है।
‘सुपरस्टार पॉलिटिक्स’ की वापसी: एमजीआर-जयललिता की परंपरा आगे
तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी सितारों का दबदबा कोई नया नहीं है। M. G. Ramachandran और J. Jayalalithaa जैसी हस्तियों ने पहले ही यह साबित किया है कि सिनेमा से राजनीति तक का सफर यहां सफल हो सकता है। अब विजय उसी परंपरा को आगे बढ़ाते दिख रहे हैं, लेकिन नए दौर की राजनीति के साथ—जहां सोशल मीडिया, युवा शक्ति और नई सोच अहम भूमिका निभा रही है।
प्रशांत किशोर बनने से बचे, बना दिया ‘विजेता मॉडल’
राजनीति में एंट्री करने वाले कई नए चेहरे अपनी लोकप्रियता को वोट में नहीं बदल पाते। Prashant Kishor इसका हालिया उदाहरण रहे, जिनकी बिहार में ‘जन सुराज’ पहल चुनावी सफलता नहीं दिला सकी। लेकिन विजय ने इस चुनौती को पार कर लिया। उन्होंने दिखा दिया कि सिर्फ भीड़ जुटाना ही नहीं, बल्कि उसे वोट में बदलना ही असली जीत है।
क्या बदल जाएगा तमिलनाडु का सियासी नक्शा?
अगर टीवीके बहुमत हासिल कर लेती है, तो यह तमिलनाडु की राजनीति में एक युग परिवर्तन होगा। यह सिर्फ सरकार बदलने का मामला नहीं होगा, बल्कि पूरे राजनीतिक ढांचे में बदलाव की शुरुआत मानी जाएगी। नई नीतियां, नई प्राथमिकताएं और नई राजनीतिक संस्कृति—ये सब बदलाव आने वाले समय में देखने को मिल सकते हैं।
निष्कर्ष: ‘थलपति’ का उदय, नई राजनीति का संकेत
विजय थलपति का उभार यह साफ संदेश देता है कि भारतीय राजनीति में अब नए चेहरे और नए प्रयोग सफल हो सकते हैं। फिल्मी दुनिया से निकलकर सीधे सत्ता के शिखर तक पहुंचने की यह कहानी आने वाले वर्षों में कई नेताओं के लिए प्रेरणा बनेगी। अब सबकी नजर अंतिम नतीजों पर टिकी है—क्या ‘थलपति’ सच में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनेंगे या आखिरी पल में तस्वीर बदल जाएगी?