Social Sharing icon

देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े एक बेहद संवेदनशील और अहम मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब इन नियमों को लेकर देशभर में असंतोष, विरोध और संवैधानिक बहस तेज़ हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की है और साफ संकेत दिए हैं कि शिक्षा परिसरों में किसी भी प्रकार का भेदभाव या अलगाव स्वीकार्य नहीं होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा 23 जनवरी 2026 को अधिसूचित “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना” नामक नए विनियमों पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने इन नियमों को चुनौती देने वाली 12 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ये नियम न केवल मनमाने और भेदभावपूर्ण हैं, बल्कि भारतीय संविधान और UGC अधिनियम, 1956 के भी खिलाफ जाते हैं।

क्यों विवादों में हैं UGC के नए नियम?

UGC के नए नियमों का उद्देश्य कथित तौर पर कैंपस में समानता को बढ़ावा देना बताया गया है, लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन नियमों के कुछ प्रावधान जाति आधारित पहचान को और गहरा करते हैं। विशेष रूप से धारा 3C और 3E को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिनमें भेदभाव की परिभाषा को लेकर अस्पष्टता और एकतरफापन होने का आरोप है। वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने अदालत में दलील दी कि कानून यह मानकर नहीं चल सकता कि भेदभाव केवल एक ही वर्ग के खिलाफ होगा। उन्होंने कहा कि जब संविधान का अनुच्छेद 14 पहले से समानता का अधिकार देता है, तो नई परिभाषा उसी मूल भावना को कमजोर करती है।

CJI की तीखी टिप्पणी: “क्या हम प्रतिगामी समाज बन रहे हैं?”

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की टिप्पणियों ने इस सुनवाई को और भी अहम बना दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि— “75 वर्षों में हमने जो वर्गहीन समाज बनाने की दिशा में प्रगति की है, क्या हम अब पीछे की ओर जा रहे हैं?” CJI ने रैगिंग के मुद्दे को उठाते हुए कहा कि सबसे अधिक प्रभावित वे छात्र होते हैं जो उत्तर-पूर्व या दक्षिण भारत से देश के अन्य हिस्सों में पढ़ने आते हैं। सांस्कृतिक भिन्नता को न समझ पाने के कारण व्यंग्यात्मक टिप्पणियां की जाती हैं, जो कई बार मानसिक उत्पीड़न का रूप ले लेती हैं। उन्होंने अलग-अलग हॉस्टल की अवधारणा पर भी कड़ा एतराज जताते हुए कहा— “भगवान के लिए, अलग हॉस्टल? हम सबने एक साथ हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की है। अंतरजातीय विवाह होते हैं, समाज को जोड़ने की जरूरत है, तोड़ने की नहीं।”

‘रैगिंग’ शब्द का न होना भी सवालों के घेरे में

वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि नए UGC नियमों में ‘रैगिंग’ जैसे गंभीर शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, जबकि कैंपस में उत्पीड़न की यह एक बड़ी समस्या रही है। उन्होंने इसे नियमों की एक गंभीर खामी बताया।

अदालत का रुख: आदेश नहीं, लेकिन चिंता साफ

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दिन कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया, लेकिन CJI ने साफ कहा कि— “कोर्ट को विश्वास में लिया जाना चाहिए। पूरे समाज का विकास होना चाहिए।” कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सुझाव दिया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर कुछ प्रतिष्ठित और निष्पक्ष व्यक्तियों की एक समिति बनाई जा सकती है, जो यह सुनिश्चित करे कि उच्च शिक्षा संस्थान बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ें।

पुराने नियम और नई बहस

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि 2012 के UGC नियमों को चुनौती देने वाली एक याचिका 2019 से लंबित है और अब उन्हीं की जगह 2026 के नए नियम लाए गए हैं। इस पर CJI ने स्पष्ट किया कि अदालत 2012 के नियमों की गहराई में जाकर पुनः जांच नहीं करेगी, बल्कि वर्तमान संदर्भ में नए नियमों की संवैधानिकता पर विचार करेगी।

कैंपस में अलगाव नहीं—सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि शैक्षणिक परिसरों में किसी भी प्रकार का अलगाव स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, न कि नई दीवारें खड़ी करना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *