अजमेर शरीफ। कुछ विरासतें सिर्फ नाम से नहीं, बल्कि अपने काम, अपनी सोच और इंसानियत की खिदमत से पहचानी जाती हैं। अजमेर शरीफ में सम्पन्न हुआ जश्न-ए-गौसिया सर्वधर्म सम्मेलन भी ऐसी ही एक परंपरा का हिस्सा बना, जिसकी शुरुआत करीब 56 साल पहले पीरो-मुर्शिद सैयद अरशद चिश्ती बाबा साहब ने की थी। उनके द्वारा शुरू किए गए खिदमत के इस कारवां को आज उनके जानशीन सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब आगे बढ़ा रहे हैं। पुरानी विरासत को संभालते हुए उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने और अमन, भाईचारे तथा इंसानियत के संदेश को मजबूत करने का प्रयास इस आयोजन के केंद्र में रहा।
अहाता-ए-नूर, दरगाह हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती गरीब नवाज, अजमेर शरीफ में आयोजित जश्न-ए-गौसिया सर्वधर्म सम्मेलन में सैयद सैफुद्दीन कुतुबी, ख्वाजा कुतबी दिल्ली और सैयद शरफुद्दीन कुतुबी की मौजूदगी भी रही। आयोजन के जरिए खिदमत की उस परंपरा को सामने लाया गया, जो करीब साढ़े पांच दशक पहले शुरू हुई थी। यह आयोजन महज एक धार्मिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अपने बुजुर्गों की विरासत, सेवा की भावना और समाज में आपसी सद्भाव बनाए रखने के संदेश से भी जुड़ा रहा।
बुजुर्गों से मिली विरासत को संभालकर आगे बढ़ा रहे सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब
किसी परंपरा को शुरू करना जितना अहम होता है, उसे समय के साथ संभालकर आगे बढ़ाना भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी होती है। पीरो-मुर्शिद सैयद अरशद चिश्ती बाबा साहब ने करीब 56 साल पहले खिदमत का जो सिलसिला शुरू किया था, उनके बाद उनके जानशीन सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब ने उस विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली। आज जश्न-ए-गौसिया सर्वधर्म सम्मेलन जैसे आयोजन इसी निरंतरता की पहचान बनकर सामने आते हैं। इस विरासत का महत्व सिर्फ इसके लंबे इतिहास में नहीं, बल्कि उस विचार में भी है, जिसमें इंसानियत की सेवा, आपसी मोहब्बत और भाईचारे को प्राथमिकता दी जाती है। सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब के नेतृत्व में इस परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास इस बात को रेखांकित करता है कि बुजुर्गों से मिली जिम्मेदारी को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी खिदमत का एक अहम हिस्सा है।
56 साल पहले शुरू हुआ खिदमत का कारवां, आज भी कायम है परंपरा
पीरो-मुर्शिद सैयद अरशद चिश्ती बाबा साहब ने जिस सोच के साथ इस कारवां की शुरुआत की थी, उसका मूल उद्देश्य लोगों को जोड़ना, जरूरतमंदों की सहायता करना और समाज में प्रेम तथा सद्भाव का संदेश पहुंचाना था। समय के साथ परिस्थितियां बदलीं और पीढ़ियां आगे बढ़ीं, लेकिन इस परंपरा को कायम रखने की कोशिश जारी रही। सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब के माध्यम से इस विरासत को आगे बढ़ाने का प्रयास उसी ऐतिहासिक सिलसिले की अगली कड़ी है। जश्न-ए-गौसिया सर्वधर्म सम्मेलन ने एक बार फिर इस परंपरा को चर्चा में लाने का अवसर दिया। आयोजन के माध्यम से यह संदेश सामने आया कि किसी भी धार्मिक या सामाजिक परंपरा की वास्तविक पहचान उसके मूल्यों और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी से बनती है।
न चढ़ावा, न नजराना—खिदमत को लेकर अलग व्यवस्था का दावा
जश्न-ए-गौसिया से जुड़ी एक विशेष बात आयोजन के पोस्टर पर भी दर्ज की गई थी। पोस्टर में दावा किया गया कि खानकाह में किसी प्रकार का चढ़ावा या नजराना नहीं लिया जाता और खिदमत से जुड़े कार्य बाबा साहब की निजी व्यवस्था से किए जाते हैं। इस व्यवस्था को आयोजन से जुड़ी सेवा भावना के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसके पीछे विचार यह बताया गया है कि जरूरतमंदों की सहायता और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों को आर्थिक लेन-देन के बजाय खिदमत की भावना से आगे बढ़ाया जाए। सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब के नेतृत्व में इस परंपरा को आगे बढ़ाने की चर्चा के बीच यह पहल आयोजन की पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू रही।
सिर्फ एक दिन का आयोजन नहीं, सालभर खिदमत की सोच
खिदमत का अर्थ केवल किसी महफिल या धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन करना नहीं है। जरूरतमंदों की सहायता, जायरीनों और मेहमानों की सेवा, भोजन वितरण तथा सामाजिक स्तर पर सहयोग जैसे कार्य भी इस भावना से जुड़े हैं। आयोजन से संबंधित पोस्टर में सालभर चलने वाली खिदमत की गतिविधियों का उल्लेख किया गया था। इसका उद्देश्य सेवा को किसी एक दिन या खास अवसर तक सीमित न रखकर निरंतर चलने वाली जिम्मेदारी के रूप में सामने लाना है। यही सोच इस विरासत को केवल अतीत की कहानी बनने से रोकती है। बुजुर्गों से मिली परंपरा को वर्तमान में जीवित रखना और उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना इस सिलसिले की अहम कड़ी है।
जश्न-ए-गौसिया सर्वधर्म सम्मेलन में गूंजा अमन और भाईचारे का संदेश
अजमेर शरीफ की पहचान सूफी परंपरा, मोहब्बत और आपसी सद्भाव से जुड़ी रही है। इसी माहौल में सम्पन्न हुए जश्न-ए-गौसिया सर्वधर्म सम्मेलन ने अमन और इंसानियत के संदेश को केंद्र में रखा। कार्यक्रम के निर्धारित स्वरूप में महफिल-ए-कव्वाली, फातिहा, दुआ-ए-खैर और तबर्रुक वितरण जैसे धार्मिक आयोजन शामिल थे। सम्मेलन में सैयद सैफुद्दीन कुतुबी, ख्वाजा कुतबी दिल्ली और सैयद शरफुद्दीन कुतुबी की मौजूदगी ने आयोजन को विशिष्टता प्रदान की। सम्मेलन की मूल भावना विभिन्न धर्मों और समुदायों के बीच आपसी सम्मान तथा भाईचारे को बढ़ावा देना रही। इस तरह आयोजन ने धार्मिक परंपरा को सामाजिक सद्भाव के संदेश से जोड़ने का प्रयास किया। इसका संदेश यही है कि इंसानियत की सेवा और दूसरों की भावनाओं का सम्मान समाज को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सैयद अरशद चिश्ती बाबा साहब की विरासत, सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब के जरिए आगे का सफर
करीब 56 साल पहले पीरो-मुर्शिद सैयद अरशद चिश्ती बाबा साहब ने खिदमत के जिस सिलसिले की नींव रखी थी, आज उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनके जानशीन सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब निभा रहे हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंची यह परंपरा अपने इतिहास के साथ-साथ सेवा और सामाजिक सद्भाव की सोच को भी आगे ले जाने का प्रयास कर रही है। जश्न-ए-गौसिया सर्वधर्म सम्मेलन का सम्पन्न होना इसी विरासत से जुड़े आयोजन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। इस मौके पर सैयद सैफुद्दीन कुतुबी, ख्वाजा कुतबी दिल्ली और सैयद शरफुद्दीन कुतुबी की मौजूदगी के बीच अमन, इंसानियत और भाईचारे के संदेश को प्रमुखता मिली। सैयद खुशतर चिश्ती बाबा साहब के नेतृत्व में खिदमत के इस कारवां को आगे बढ़ाने का प्रयास इसी जिम्मेदारी की ओर संकेत करता है। 56 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा का संदेश साफ है—विरासत वही जीवित रहती है, जिसे अगली पीढ़ी जिम्मेदारी के साथ संभाले और इंसानियत की सेवा के रास्ते पर आगे बढ़ाए।