bareillyएसआरएमएस रिद्धिमा में रविवार शाम प्रसिद्ध साहित्यकार दूधनाथ सिंह लिखित नाटक ‘पुरुषमेध’ का प्रभावशाली मंचन

रिद्धिमा में दूधनाथ सिंह के चर्चित नाटक का मंचन, पुरूरवा के संघर्ष के जरिए व्यवस्था और विद्रोह के सवालों को किया जीवंत

बरेली। एसआरएमएस रिद्धिमा में रविवार शाम प्रसिद्ध साहित्यकार दूधनाथ सिंह लिखित नाटक ‘पुरुषमेध’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। अम्बुज कुकरेती और विनायक कुमार श्रीवास्तव के निर्देशन में प्रस्तुत नाटक ने पौराणिक कथा के माध्यम से सत्ता, परंपरा, धार्मिक कर्मकांड, सामाजिक व्यवस्था, स्वतंत्रता और मनुष्य के अस्तित्व जैसे सवालों को रंगमंच पर जीवंत किया।

राजसत्ता और कर्मकांड के खिलाफ पुरूरवा का विद्रोह

नाटक की कथा युवराज पुरूरवा के राज्याभिषेक की तैयारियों से शुरू होती है। पुरूरवा परंपरागत राजसत्ता और उन धार्मिक कर्मकांडों को स्वीकार करने से इनकार करता है, जिनमें उसे शोषण और रक्तपात दिखाई देता है। पुरोहित विभावक और कश्यप से उसका वैचारिक टकराव इसी संघर्ष को सामने लाता है। दोनों इंद्र से मिलकर पुरूरवा के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं, जबकि महर्षि वशिष्ठ उसके विचारों को वैचारिक समर्थन देते हैं।

इला और उर्वशी के जरिए उठे अस्तित्व और स्वतंत्रता के सवाल

नाटक में इला का चरित्र स्त्री पहचान और अस्तित्व के प्रश्न को सामने लाता है। वहीं उर्वशी को केवल अप्सरा के पारंपरिक रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। पुरूरवा और उर्वशी के संबंधों के माध्यम से स्त्री की इच्छा, स्वतंत्रता और अपनी भूमिका चुनने के अधिकार का सवाल उभरता है। उर्वशी को पुरूरवा में मुक्ति की संभावना दिखाई देती है।

पुरूरवा की आवाज दबाने को रचा गया पुरुषमेध

पुरूरवा यज्ञ-विधान में बदलाव, जनता को अग्नि और अधिकार देने तथा शोषणकारी व्यवस्था का विरोध करता है। इससे वह स्थापित सत्ता के लिए चुनौती बन जाता है। उसके खिलाफ प्रचार कर उसे यज्ञ-विध्वंसक, हत्यारा और आर्यों का शत्रु बताया जाता है। सत्ता के विरोध में उठी आवाज को दबाने के लिए अंततः ‘पुरुषमेध’ की तैयारी होती है और पुरूरवा का वध कर दिया जाता है।

विचार की लौ को मृत्यु भी नहीं बुझा पाती

नाटक का अंतिम दृश्य पुरूरवा के संघर्ष को व्यापक मानवीय अर्थ देता है। वशिष्ठ, इला और अन्य पात्र उसकी स्मृति और विचार को जीवित रखते हैं। संदेश उभरता है कि शरीर का अंत विचारों और चेतना का अंत नहीं होता। अंतिम सामूहिक स्वर—पुरूरवा, तुम इस कलयुग में लौटो नाटक के मूल संघर्ष को वर्तमान से जोड़ देता है।

कलाकारों के अभिनय ने बांधा दर्शकों को

पुरूरवा की भूमिका पंकज कुकरेती और इंद्र की भूमिका संजय सिंह ने निभाई। चंपा उपाध्याय ने उर्वशी, सोनालिका सक्सेना ने इला, सोहम तिवारी ने वशिष्ठ, इल्हाम ने विभावक, विनायक श्रीवास्तव ने कश्यप, शत्रुघ्न शर्मा ने सूर्यबाहु, निशांत कुमार ने वज्र, दुर्गेश ने विश्वावसु, कमल शर्मा ने सनत कुमार और गौरव कार्की ने चित्रसेन की भूमिका निभाई। सभी कलाकारों ने अपने अभिनय से मंचन को प्रभावी बनाया।

तकनीकी टीम और गणमान्य लोग रहे मौजूद

नाटक में कोरियोग्राफी की जिम्मेदारी तनाया भट्टाचार्य ने संभाली। साउंड संचालन अरुण सैनी और जाफर तथा प्रकाश संचालन जसवंत सिंह ने किया। इस अवसर पर एसआरएमएस ट्रस्ट के संस्थापक एवं चेयरमैन देव मूर्ति, आशा मूर्ति, आदित्य मूर्ति, ऋचा मूर्ति, उषा गुप्ता, गुरु मेहरोत्रा, डॉ. प्रभाकर गुप्ता, डॉ. अनुज कुमार, डॉ. शैलेश सक्सेना और डॉ. रीता शर्मा सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

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