बुंदेलखंड की धरती पर होली का रंग कुछ अलग ही अंदाज में चढ़ता है। यहां फाग गीतों, ढोलक की थाप और परंपरा की मिठास में सैकड़ों साल का इतिहास बोलता है। लेकिन हमीरपुर जिले का कुंडौरा गांव इस मायने में खास है कि यहां होली का केंद्र पुरुष नहीं, बल्कि महिलाएं होती हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस गांव में जब महिलाओं की फाग निकलती है, तो गांव के पुरुष या तो घरों में कैद हो जाते हैं या फिर गांव से बाहर खेत-खलिहान की ओर निकल जाते हैं।
रामजानकी मंदिर से शुरू होती है परंपरा
कुंडौरा गांव की होली का शुभारंभ ऐतिहासिक रामजानकी मंदिर से होता है। होली के दूज के दिन गांव की सभी महिलाएं मंदिर परिसर में एकत्र होती हैं। यहां पूजा-अर्चना के बाद ढोल और मजीरों की थाप पर फाग की शुरुआत होती है। महिलाएं गाजे-बाजे के साथ गांव की गलियों और मोहल्लों में घूमती हैं। यह यात्रा केवल एक जुलूस नहीं, बल्कि महिलाओं की सामूहिक शक्ति और उत्सव का प्रदर्शन है। पूरे दिन गांव की गलियां महिलाओं के रंग, हंसी और गीतों से गूंजती रहती हैं।
फाग निकले तो ‘गायब’ हो जाते हैं पुरुष
गांव की बुजुर्ग देवरती कुशवाहा बताती हैं कि यह परंपरा कम से कम 500 साल पुरानी है। उनके अनुसार, जब महिलाएं फाग निकालती हैं, तब गांव के किसी भी पुरुष को उन्हें देखने की इजाजत नहीं होती। अगर कोई देखने की कोशिश भी करे, तो उसे लट्ठ लेकर खदेड़ दिया जाता है। गांव की सरपंच सविता देवी कहती हैं कि यह नियम सैकड़ों साल से चला आ रहा है। महिलाएं जब फाग निकालती हैं तो पुरुष पहले ही घरों में बंद हो जाते हैं या फिर गांव छोड़कर बाहर चले जाते हैं। जब तक फाग और होली का समापन नहीं हो जाता, पुरुष वापस गांव की गलियों में नहीं आते।
घूंघट में ठुमके, ढोल-मजीरों की गूंज
कुंडौरा की खासियत यह है कि यहां बुजुर्ग महिलाएं ही ढोल और मजीरे बजाती हैं। 72 वर्षीय गिरिजा कुशवाहा बताती हैं कि गांव की हर बहू इस परंपरा का हिस्सा बनती है। घूंघट में सजी महिलाएं गीत गाती हैं, ठुमके लगाती हैं और एक-दूसरे को गुलाल लगाकर सम्मान देती हैं। यह आयोजन सुबह से शुरू होकर शाम तक चलता है। हर घर से महिलाएं इसमें शामिल होती हैं। गांव की गलियां रंग और उल्लास से भर उठती हैं।
कैमरे की सख्त मनाही
इस अनोखी होली में एक और खास नियम है—कोई पुरुष फोटो नहीं ले सकता। बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि अगर कोई चोरी-छिपे फोटो लेता पकड़ा गया, तो उस पर जुर्माना लगाया जाता है। यह नियम महिलाओं की निजता और परंपरा की गरिमा को बनाए रखने के लिए बनाया गया है। आधुनिक दौर में जहां हर त्योहार सोशल मीडिया पर लाइव होता है, वहीं कुंडौरा की होली अब भी कैमरों से दूर अपनी सादगी में जीवित है।
सैकड़ों साल पुरानी विरासत
गांव के लोगों का दावा है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों ने सैकड़ों साल पहले शुरू की थी। यह सिर्फ होली खेलने का तरीका नहीं, बल्कि महिलाओं को एक दिन की पूर्ण स्वतंत्रता और सम्मान देने की रस्म है। प्रधानपति अरविंद प्रताप सिंह बताते हैं कि महिलाएं इस आयोजन की तैयारी कई दिन पहले से शुरू कर देती हैं। गांव के पुरुष भी इस परंपरा का सम्मान करते हैं और नियमों का पालन करते हैं।
क्यों खास है कुंडौरा की होली?
बुंदेलखंड में होली के कई रंग देखे जाते हैं, लेकिन कुंडौरा की होली महिलाओं के वर्चस्व और परंपरा के कारण अद्वितीय है। यहां होली के दिन गांव की बागडोर महिलाओं के हाथ में होती है। उनके गीतों में मस्ती भी होती है और सामाजिक संदेश भी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह परंपरा ग्रामीण समाज में महिलाओं की भूमिका को रेखांकित करती है। यह उस दौर की याद दिलाती है जब लोक परंपराएं सामाजिक संतुलन बनाए रखने का माध्यम थीं।
परंपरा और आधुनिकता का संगम
आज जब समाज तेजी से बदल रहा है, तब भी कुंडौरा की महिलाएं इस परंपरा को पूरी निष्ठा से निभा रही हैं। घूंघट में ढोल बजाना और नृत्य करना केवल रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। हालांकि समय के साथ गांव में शिक्षा और तकनीक पहुंची है, लेकिन होली के इस दिन गांव अपनी पुरानी पहचान में लौट आता है।