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देश में ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। सरकार ने कानून में बदलाव कर पहचान और प्रमाणन की प्रक्रिया को सख्त करने का प्रस्ताव दिया है, लेकिन विपक्ष इसे सीधे तौर पर संवैधानिक अधिकारों पर हमला बता रहा है। संसद में तीखी बहस और सड़कों पर विरोध के बीच यह सवाल उठ खड़ा हुआ है—क्या यह सुधार है या अधिकारों पर नई पाबंदी?

संसद में हंगामा, संशोधन बिल से मची सियासी हलचल

लोकसभा और राज्यसभा में ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट में संशोधन को मंजूरी मिलते ही राजनीतिक माहौल गरमा गया। सदन के अंदर तीखी बहस देखने को मिली, वहीं बाहर विभिन्न संगठनों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। कांग्रेस सांसद तिरुची शिवा ने इस बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग की, ताकि इस पर विस्तार से चर्चा हो सके। लेकिन सरकार ने इस प्रस्ताव को तुरंत खारिज कर दिया। यह घटनाक्रम दिखाता है कि यह सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि देश की सामाजिक और संवैधानिक दिशा को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा बन चुका है।

क्या कहता है नया संशोधन? पहचान की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव

सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन में ट्रांसजेंडर की पहचान को लेकर नई प्रक्रिया तय की गई है। पहले जहां कोई भी व्यक्ति डीएम से सर्टिफिकेट लेकर अपनी पहचान दर्ज करा सकता था, अब यह प्रक्रिया दो चरणों में होगी। नए नियमों के तहत पहले मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) से प्रमाणन लेना होगा, फिर डीएम के पास आवेदन करना होगा। इसके साथ ही अस्पताल से सर्जरी से संबंधित जानकारी भी ली जाएगी। यह बदलाव सीधे तौर पर “सेल्फ-आइडेंटिटी” यानी स्वयं की पहचान के अधिकार को सीमित करता हुआ नजर आ रहा है, जो पहले कानून का प्रमुख आधार था।

सजा का सख्त प्रावधान, नए कानून में कड़ी धार

नए संशोधन में सजा के प्रावधान को भी सख्त किया गया है। यदि किसी बच्चे को जबरदस्ती ट्रांसजेंडर बनाया जाता है, तो इसके लिए आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। वहीं, वयस्कों के मामलों में 10 साल तक की सजा और 2 लाख रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। सरकार का तर्क है कि इससे जबरन या धोखे से किए जाने वाले मामलों पर रोक लगेगी, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह प्रावधान असल समुदाय को ही डराने वाला बन सकता है।

विपक्ष का हमला—‘संवैधानिक अधिकारों पर सीधा वार’

विपक्ष ने इस संशोधन का जोरदार विरोध किया है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसे ट्रांसजेंडर समुदाय की पहचान और अधिकारों पर सीधा हमला बताया। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि यह बिल बिना पर्याप्त चर्चा और सलाह-मशविरे के लाया गया है, जिससे समुदाय के बड़े हिस्से को कानूनी रूप से “अदृश्य” बना देने का खतरा है। राजद सांसद मनोज झा ने इसे “संवैधानिक नैतिकता बनाम बहुसंख्यकवाद” की लड़ाई बताया, जबकि सपा सांसद जया बच्चन ने इसे जेपीसी को भेजने की मांग की।

सरकार का बचाव—‘समुदाय की सुरक्षा के लिए जरूरी’

सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय की सुरक्षा और अधिकारों को मजबूत करने के लिए लाया गया है। भाजपा सांसदों ने कहा कि जब विपक्ष सत्ता में था, तब इस समुदाय के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। सरकार का दावा है कि नई परिभाषा और सख्त नियमों से धोखाधड़ी और शोषण के मामलों को रोका जा सकेगा, जिससे असली जरूरतमंद लोगों को लाभ मिलेगा।

2014 से 2026 तक—अधिकारों की लंबी यात्रा पर नया मोड़

ट्रांसजेंडर अधिकारों की लड़ाई 2014 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से शुरू हुई, जिसमें उन्हें तीसरे जेंडर का दर्जा दिया गया। इसके बाद 2019 में केंद्र सरकार ने कानून बनाकर उन्हें पहचान और अधिकार देने की कोशिश की। लेकिन 2026 का यह संशोधन एक नया मोड़ लेकर आया है, जहां पहचान की प्रक्रिया को फिर से परिभाषित किया जा रहा है। अब सवाल यह है कि यह बदलाव समुदाय को सशक्त करेगा या फिर उनके अधिकारों को सीमित करेगा—इसका जवाब आने वाले समय में ही मिलेगा।

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