पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। ममता बनर्जी सरकार और तृणमूल कांग्रेस नेताओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या अदालत के पास पश्चिम बंगाल के SIR के अलावा सुनने के लिए कोई और मामला नहीं है। कोर्ट ने सरकार को अस्पष्ट और अप्रासंगिक कारणों से बार-बार अदालत आने पर कड़ी नाराज़गी भी जताई।
अदालत ने सरकार को दी कड़ी नसीहत
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत को अनावश्यक विवादों में उलझाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि बार-बार अलग-अलग कारणों से कोर्ट में आना और प्रक्रिया को लंबा करना न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव डालता है। पीठ ने कहा कि अदालत पहले ही इस मामले में अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर हस्तक्षेप कर चुकी है। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए न्यायिक अधिकारियों को इस प्रक्रिया में शामिल करने का निर्देश दिया था, जबकि यह कार्य मूल रूप से चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है।
50 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों की जांच
विवाद की जड़ में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) है, जिसके तहत करीब 50 लाख मतदाताओं द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों की जांच की जानी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए पश्चिम बंगाल के साथ-साथ झारखंड और ओडिशा के न्यायिक अधिकारियों को भी इस जांच में शामिल करने का आदेश दिया था। कोर्ट का कहना है कि कई मामलों में मतदाताओं द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों में तार्किक विसंगतियां और अमान्य श्रेणियां सामने आई हैं। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक अधिकारियों को प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है।
नाम हटने पर लोगों की बढ़ी परेशानी
इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता और टीएमसी की राज्यसभा उम्मीदवार मेनका गुरुस्वामी ने अदालत के सामने दलील दी कि SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम अनुचित तरीके से मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि कई लोगों ने आवश्यक दस्तावेज जमा किए थे, इसके बावजूद उनके दावे खारिज कर दिए गए। गुरुस्वामी ने अदालत को बताया कि जिन लोगों के नाम पहले मतदाता सूची में थे और जिन्होंने पहले मतदान भी किया था, उनके नाम भी सूची से हटाए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इससे बड़ी संख्या में मतदाता असमंजस की स्थिति में हैं।
अपील का अधिकार नहीं मिलने का आरोप
वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत में यह भी तर्क दिया कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाते हैं, उन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ERO) के आदेश के खिलाफ अपील करने का अधिकार होता है। लेकिन जिन मतदाताओं के दावे SIR प्रक्रिया के दौरान खारिज कर दिए गए, उन्हें यह अधिकार उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। उनका कहना था कि इससे हजारों लोग ऐसे हो गए हैं जिनके पास न्याय पाने का कोई प्रभावी रास्ता नहीं बचा है। इसी कारण इस मामले में तत्काल सुनवाई की मांग की गई।
अदालत ने उठाया बड़ा संवैधानिक सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी उठाया। अदालत ने पूछा कि जिन नौकरशाहों को चुनाव आयोग में न्यायिक अधिकारियों का कार्यभार संभालने के लिए नियुक्त किया गया है, क्या उन्हें न्यायिक अधिकारियों के आदेशों के खिलाफ अपील करने की अनुमति दी जा सकती है? पीठ ने साफ कहा कि यह स्थिति न्यायिक व्यवस्था के सिद्धांतों के विपरीत होगी और अदालत इसकी अनुमति नहीं दे सकती।
कपिल सिब्बल की दलील पर भी टिप्पणी
इससे पहले 27 फरवरी को इस मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए थे। उन्होंने चुनाव आयोग के न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण दिए जाने पर आपत्ति जताई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि सरकार को अस्पष्ट कारणों से अदालत का दरवाजा खटखटाने से बचना चाहिए। अदालत ने कहा कि हर दिन नए-नए अप्रासंगिक कारणों के साथ कोर्ट आना उचित नहीं है और इसका अंत होना चाहिए।
चुनावी माहौल में बढ़ा विवाद
पश्चिम बंगाल में आने वाले चुनावों को देखते हुए मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यही कारण है कि इस प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि SIR प्रक्रिया के नाम पर बड़ी संख्या में वैध मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुसार चल रही है।