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ईरान और इजरायल। मध्य पूर्व में जारी तनाव अब सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा भू-राजनीतिक खेल आकार लेता नजर आ रहा है। ईरान-इजरायल टकराव के बीच ‘ग्रेटर इजरायल’ का विचार फिर सुर्खियों में है। लेबनान में बफर जोन की योजना और वेस्ट बैंक पर सख्ती ने सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या यह सिर्फ सुरक्षा रणनीति है या एक बड़े विस्तारवादी एजेंडे की शुरुआत?

युद्ध की आड़ या रणनीतिक विस्तार, लेबनान में बफर जोन से उठे सवाल

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के बीच इजरायल की सैन्य गतिविधियां अब नई दिशा में जाती दिख रही हैं। इजरायली रक्षा बल (IDF) लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर एक ‘बफर जोन’ बनाने की योजना पर काम कर रहा है। आधिकारिक तौर पर इसे सुरक्षा जरूरत बताया जा रहा है, लेकिन वैश्विक स्तर पर इसे लेकर कई तरह की आशंकाएं जन्म ले चुकी हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन को बदलने की दिशा में भी एक बड़ा संकेत हो सकता है।

‘ग्रेटर इजरायल’ क्या है, बाइबिल से लेकर आधुनिक राजनीति तक की जड़ें

‘ग्रेटर इजरायल’ का विचार कोई नया नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें धार्मिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में गहराई से जुड़ी हुई हैं। हिब्रू बाइबिल के अनुसार, मिस्र की नील नदी से लेकर यूफ्रेट्स नदी तक फैली भूमि को यहूदी राष्ट्र का हिस्सा माना गया है। 19वीं सदी में यहूदी चिंतक थियोडोर हर्जल ने इस अवधारणा को आधुनिक राजनीतिक विमर्श में रखा। यह विचार एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना करता है, जिसमें आज के फिलीस्तीन, लेबनान, जॉर्डन के साथ-साथ सीरिया, इराक, मिस्र और सऊदी अरब के कुछ हिस्से शामिल हों।

1967 की जंग से मिला बल, कब्जों ने बढ़ाया विस्तार का दायरा

इतिहास के पन्नों में जाएं तो 1967 का छह दिन का युद्ध इस विचार के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस युद्ध में इजरायल ने मिस्र, सीरिया और जॉर्डन को हराकर गाजा पट्टी, वेस्ट बैंक, सिनाई प्रायद्वीप और गोलान हाइट्स पर कब्जा कर लिया। इस जीत के बाद ‘ग्रेटर इजरायल’ की अवधारणा को कुछ राजनीतिक और वैचारिक समूहों में और मजबूती मिली। यह घटना आज भी मध्य पूर्व की राजनीति और सीमाओं के विवाद का अहम आधार बनी हुई है।

नेतन्याहू युग में फिर चर्चा तेज, सियासत में बढ़ा असर

हाल के वर्षों में ‘ग्रेटर इजरायल’ का मुद्दा फिर से चर्चा में आया है, खासकर बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान। 2022 के चुनावों में लिकुड गठबंधन की जीत के बाद इस विचार को लेकर राजनीतिक हलकों में खुलकर बातें होने लगीं। 2023 में इजरायल के वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच द्वारा एक नक्शा दिखाए जाने के बाद विवाद और गहरा गया, जिसमें जॉर्डन और वेस्ट बैंक को इजरायल का हिस्सा दर्शाया गया था। इससे यह संकेत मिला कि यह विचार केवल इतिहास या धर्म तक सीमित नहीं, बल्कि सियासत में भी अपनी जगह बना रहा है।

लेबनान से सऊदी तक, क्या बढ़ रही है अगली नजर?

लेबनान में बफर जोन बनाने की कोशिशों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह आगे चलकर अन्य देशों तक भी फैल सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह रणनीति सफल होती है, तो क्षेत्र में नए तनाव पैदा हो सकते हैं। सऊदी अरब जैसे देशों का नाम भी चर्चा में आना इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा सिर्फ एक सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक बदलाव का हिस्सा हो सकता है।

आरोप, आशंकाएं और हकीकत: क्या सच में चल रहा है ‘ग्रेटर प्लान’?

हालांकि इजरायल की ओर से ‘ग्रेटर इजरायल’ को लेकर कोई आधिकारिक नीति घोषित नहीं की गई है, लेकिन हाल की गतिविधियों ने इस बहस को तेज कर दिया है। भारत समेत कई देशों के राजनीतिक नेताओं और विशेषज्ञों ने इसे लेकर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी इसे युद्ध की आड़ में विस्तारवादी एजेंडा बताया है। हालांकि कुछ विश्लेषक इसे केवल सुरक्षा नीति का हिस्सा मानते हैं। ऐसे में सच्चाई क्या है, यह अभी पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का बड़ा केंद्र बनने वाला है।

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