तेहरान, रियाद और वॉशिंगटन के बीच चली गुप्त कूटनीतिक हलचल ने मध्य पूर्व की सियासत को हिलाकर रख दिया है। आरोप है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए लगातार दबाव बनाया, जबकि सार्वजनिक मंचों पर शांति की बात कही जाती रही।
परदे के पीछे की कूटनीति या खुली साजिश?
मध्य पूर्व की राजनीति में जो दिखता है, अक्सर वह होता नहीं। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, Mohammed bin Salman ने कथित तौर पर Donald Trump को कई निजी फोन कॉल किए। इन कॉल्स में ईरान के खिलाफ सख्त सैन्य कार्रवाई की पैरवी की गई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि ट्रंप शुरुआत में कूटनीतिक समाधान की संभावना तलाश रहे थे, लेकिन रियाद और तेल अवीव से बढ़ते दबाव ने व्हाइट हाउस की रणनीति को बदल दिया।
इस्लाम की एकजुटता बनाम भू-राजनीतिक हकीकत
ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei सार्वजनिक मंचों पर इस्लामी एकता की अपील करते रहे। वे लगातार मुस्लिम देशों से “उम्माह” की मजबूती और पश्चिमी हस्तक्षेप के विरोध की बात करते थे। लेकिन जिस समय तेहरान इस्लामी एकजुटता की बात कर रहा था, उसी समय रियाद और वॉशिंगटन के बीच बातचीत का सिलसिला तेज था। यह विरोधाभास ही इस पूरे घटनाक्रम को और सनसनीखेज बनाता है।
इजरायल का दबाव और बढ़ता तनाव
इस पूरे घटनाक्रम में Benjamin Netanyahu की भूमिका भी अहम बताई जा रही है। इजरायल पहले से ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए था। सूत्रों के मुताबिक, सऊदी और इजरायल के रणनीतिक हित इस मुद्दे पर एक जैसे थे—ईरान की क्षेत्रीय ताकत को सीमित करना। यही साझा हित वॉशिंगटन तक संदेश पहुंचाने में निर्णायक साबित हुआ।
‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’—नाम में ही आक्रामकता
ट्रंप प्रशासन ने जिस सैन्य कार्रवाई को अंजाम दिया, उसे “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” नाम दिया गया। सूत्रों के हवाले से बताया गया कि इस कार्रवाई का लक्ष्य सिर्फ सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना नहीं था, बल्कि ईरान की राजनीतिक और रणनीतिक संरचना पर दबाव बनाना भी था। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने दावा किया कि यह युद्ध इराक की तरह लंबा नहीं खिंचेगा। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व में कोई भी चिंगारी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकती है।
अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट क्या कहती है?
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने तत्काल खतरे के संकेत नहीं दिए थे। यानी ईरान से अमेरिका पर तत्काल हमला होने की आशंका स्पष्ट नहीं थी। यहीं से सवाल उठता है—क्या यह हमला रणनीतिक था या राजनीतिक दबाव का परिणाम? विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका की घरेलू राजनीति और मध्य पूर्व में सहयोगियों की अपेक्षाएं मिलकर इस निर्णय को प्रभावित कर सकती थीं।
दोहरा चेहरा या मजबूरी की कूटनीति?
रियाद की सार्वजनिक भाषा और निजी संवादों के बीच अंतर ने इस पूरे प्रकरण को और विवादास्पद बना दिया है। एक ओर शांति और स्थिरता की बातें, दूसरी ओर सैन्य विकल्प पर ज़ोर। तेल आपूर्ति, क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान के प्रभाव को सीमित करने जैसे मुद्दे सऊदी रणनीति के केंद्र में बताए जा रहे हैं।