सहारनपुर। नवरात्र के पावन पर्व से ठीक पहले सहारनपुर का शाकुंभरी देवी धाम विवादों के केंद्र में आ गया है। मंदिर क्षेत्र में लगे ‘गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित’ पोस्टरों ने माहौल गरमा दिया है—आस्था, परंपरा और सामाजिक सौहार्द के बीच खड़ी इस बहस ने अब पूरे इलाके को चर्चा में ला दिया है।
नवरात्र से पहले ‘पोस्टर विवाद’… शाकुंभरी धाम में बढ़ी हलचल
सिद्धपीठ मां शाकुंभरी देवी मंदिर क्षेत्र में नवरात्र से पहले उस वक्त विवाद खड़ा हो गया, जब मंदिर परिसर और मेले के रास्तों पर ‘गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है’ लिखे पोस्टर और होर्डिंग लगा दिए गए। ये पोस्टर मंदिर के मुख्य मार्गों, प्रवेश द्वार और आसपास के प्रमुख स्थानों पर लगाए गए, जिससे श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के बीच अचानक चर्चा और हलचल तेज हो गई। हर साल लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहने वाला यह धाम इस बार धार्मिक आयोजन से पहले ही विवादों के घेरे में आ गया है।
‘केवल हिंदुओं को दुकान’… संगठनों का ऐलान और तर्क
इन पोस्टरों में सिर्फ प्रवेश पर ही नहीं, बल्कि मेले में दुकान लगाने को लेकर भी स्पष्ट संदेश दिया गया है। कुछ हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि नवरात्र मेले के दौरान केवल हिंदू समुदाय के लोगों को ही दुकान लगाने की अनुमति दी जानी चाहिए। उनका तर्क है कि यह स्थान हिंदू आस्था का प्रमुख केंद्र है और धार्मिक मर्यादाओं को बनाए रखना जरूरी है। लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए वे इस निर्णय को परंपरा और सुरक्षा से जोड़कर पेश कर रहे हैं।
आस्था बनाम सौहार्द… समाज में बंटी राय, बढ़ी बहस
इस पूरे मामले को लेकर समाज में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे धार्मिक परंपरा और आस्था की रक्षा के रूप में देख रहे हैं, जबकि दूसरी ओर कई लोग इसे सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे के लिए खतरा बता रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह मुद्दा अब बहस का विषय बन चुका है। बाजारों, चौपालों और सोशल मीडिया तक—हर जगह इसी मुद्दे पर चर्चा हो रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या धार्मिक आयोजन के नाम पर इस तरह के प्रतिबंध उचित हैं या इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
हर साल लाखों श्रद्धालु… मेले की भव्यता और आर्थिक असर
सिद्धपीठ मां शाकुंभरी देवी मंदिर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत आस्था का केंद्र है। नवरात्र के दौरान यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें लाखों लोग माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस दौरान अस्थायी बाजार सजते हैं, जहां खाने-पीने, खिलौनों और पूजा सामग्री की सैकड़ों दुकानें लगती हैं। यह मेला न सिर्फ धार्मिक बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में इस तरह के पोस्टरों से मेले के स्वरूप और स्थानीय व्यापार पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
प्रशासन की चुप्पी… बढ़ते विवाद के बीच नजरें फैसले पर
सबसे अहम बात यह है कि इस पूरे विवाद पर अब तक प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। पोस्टर लगाए जाने के बाद भी प्रशासन की चुप्पी ने सवाल खड़े कर दिए हैं। लोग यह जानना चाहते हैं कि क्या यह कदम प्रशासन की जानकारी में उठाया गया या यह पूरी तरह संगठनों की पहल है। फिलहाल पुलिस और प्रशासन हालात पर नजर बनाए हुए हैं, लेकिन जैसे-जैसे नवरात्र नजदीक आ रहे हैं, इस मुद्दे पर किसी स्पष्ट निर्णय की जरूरत महसूस की जा रही है।