नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल दौरे से पहले पश्चिम एशिया की राजनीति में नई हलचल तेज हो गई है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जिस ‘हेक्सागन’ गठबंधन का जिक्र किया है, उसने भू-राजनीतिक समीकरणों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह ईरान के प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति है? क्या भारत इस क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे का अहम स्तंभ बनेगा? मोदी की यात्रा इन सवालों के बीच हो रही है।
‘हेक्सागन’ गठबंधन क्या है?
नेतन्याहू ने जिस “Hexagon of Alliance” की बात कही, वह एक प्रस्तावित छह-देशों का स्ट्रेटेजिक फ्रेमवर्क है। इसमें इजरायल और भारत के अलावा ग्रीस, साइप्रस और कुछ अरब/अफ्रीकी देशों को जोड़ने की परिकल्पना की गई है। हेक्सागन शब्द का अर्थ है छह कोणों वाला ढांचा—यानी छह प्रमुख रणनीतिक साझेदारों का नेटवर्क। इसका मकसद पश्चिम एशिया और मेडिटेरेनियन क्षेत्र में आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाना बताया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस फ्रेमवर्क का एक बड़ा उद्देश्य ईरान-समर्थित नेटवर्क, जिसे कई विश्लेषक “शिया एक्सिस” या “Axis of Resistance” कहते हैं, के प्रभाव को संतुलित करना है।
ईरान फैक्टर और क्षेत्रीय तनाव
7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले के बाद गाजा युद्ध ने पूरे मिडिल ईस्ट को अस्थिर कर दिया। इजरायल और ईरान के बीच सीधी और परोक्ष टकराव की स्थिति कई बार बनी। लेबनान में हिज़्बुल्लाह और अन्य ईरान-समर्थित समूहों की सक्रियता ने इजरायली सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट रखा। 2024 में हुई सीमित लेकिन तीखी सैन्य झड़पों ने यह स्पष्ट कर दिया कि क्षेत्र में शक्तियों का पुनर्गठन जारी है। ऐसे में नेतन्याहू का ‘हेक्सागन’ विजन सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
क्या यह NATO जैसा गठबंधन होगा?
हालांकि अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इस पर संदेह जता रहे हैं। कई सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यह एक औपचारिक NATO-स्टाइल ट्रीटी से ज्यादा एक फ्लेक्सिबल कोऑर्डिनेशन प्लेटफॉर्म हो सकता है। ब्रिटेन के किंग्स कॉलेज लंदन से जुड़े प्रोफेसर एंड्रियास क्रेग (Al Jazeera से बातचीत में) ने कहा कि यह जरूरी नहीं कि यह एक बाध्यकारी सैन्य संधि हो। बल्कि यह ट्रांजैक्शनल डिप्लोमेसी और मुद्दा-आधारित सहयोग का ढांचा भी हो सकता है।
भारत की भूमिका कितनी अहम?
भारत पारंपरिक रूप से संतुलित विदेश नीति अपनाता रहा है। एक ओर उसके इजरायल से गहरे रक्षा संबंध हैं, दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा और चाबहार पोर्ट जैसे रणनीतिक हित भी जुड़े हैं। ऐसे में सवाल उठता है—क्या भारत खुलकर किसी “एंटी-ईरान फ्रेमवर्क” का हिस्सा बनेगा? या वह इसे केवल आर्थिक-सुरक्षा सहयोग के रूप में देखेगा? विश्लेषकों का मानना है कि भारत की प्राथमिकता ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ है, न कि किसी एक ब्लॉक में बंधना। इसलिए संभव है कि भारत इस फ्रेमवर्क को टेक्नोलॉजी, समुद्री सुरक्षा और काउंटर-टेररिज्म सहयोग तक सीमित रखे।
ICC वारंट और कूटनीतिक पेच
इस प्रस्तावित हेक्सागन में जिन देशों का नाम लिया गया है—ग्रीस और साइप्रस—उनमें से कुछ इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) के सदस्य हैं। गाजा में कथित युद्ध अपराधों को लेकर International Criminal Court ने नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। कानूनी रूप से ICC सदस्य देशों को ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करना होगा, यदि वह उनके क्षेत्र में प्रवेश करता है। यह पहलू हेक्सागन फ्रेमवर्क को और जटिल बनाता है।
क्या बदलेंगे पश्चिम एशिया के समीकरण?
यदि हेक्सागन फ्रेमवर्क किसी रूप में आकार लेता है तो यह मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। भारत के शामिल होने से यह एक एशिया-मेडिटेरेनियन कनेक्ट का रूप ले सकता है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा सप्लाई चेन और टेक्नोलॉजी साझेदारी इसके केंद्र में रह सकती है। मोदी–नेतन्याहू मुलाकात सिर्फ द्विपक्षीय एजेंडा तक सीमित नहीं दिख रही। इसमें क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी रणनीति, रक्षा उत्पादन सहयोग और संभवतः AI व साइबर सुरक्षा जैसे विषय भी शामिल हो सकते हैं।