समुद्र की हजारों फीट गहराई में चलने वाली पनडुब्बियां सिर्फ युद्ध का हथियार नहीं बल्कि एक बंद स्टील की दुनिया होती हैं, जहां सैनिक कई-कई हफ्तों तक बिना सूरज की रोशनी और प्राकृतिक हवा के काम करते हैं। भारतीय नौसेना के पनडुब्बी सैनिक दुनिया के सबसे कठिन वातावरण में ड्यूटी करते हैं, लेकिन दशकों की सेवा के बावजूद यह सवाल अब भी रहस्य बना हुआ है कि इस बंद और तनावपूर्ण माहौल का मानव शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय में क्या असर पड़ता है।
समुद्र की गहराइयों में छिपी एक अलग दुनिया
समुद्र की सतह के नीचे एक ऐसी दुनिया है जिसे आम लोग सिर्फ फिल्मों या किताबों में ही देख पाते हैं। लेकिन भारतीय नौसेना के पनडुब्बी सैनिकों के लिए यह दुनिया रोजमर्रा की हकीकत है। हजारों फीट गहराई में, सीमित जगह और कृत्रिम हवा के बीच काम करना दुनिया की सबसे कठिन सैन्य सेवाओं में गिना जाता है। पनडुब्बी के भीतर जीवन बिल्कुल अलग होता है। वहां न सूरज दिखाई देता है, न खुला आसमान और न ही ताजी हवा। इसके बावजूद सैनिक कई-कई हफ्तों तक अपने मिशन को अंजाम देते रहते हैं।
स्टील के बंद सिलेंडर जैसी होती है पनडुब्बी
भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कमोडोर अनिल जय सिंह बताते हैं कि पनडुब्बी में रहना एक बंद स्टील के सिलेंडर में जिंदगी बिताने जैसा होता है। उन्होंने 1981 से 2011 तक करीब 30 साल भारतीय नौसेना में सेवा दी और चार पनडुब्बियों की कमान संभाली। उनका कहना है कि पनडुब्बी सिर्फ एक जहाज नहीं होती, बल्कि यह एक पूरी तरह बंद लाइफ सपोर्ट सिस्टम होती है जो अपने अंदर मौजूद क्रू के लिए हवा, पानी और तापमान का संतुलन खुद बनाती है। उनके अनुसार पनडुब्बी के अंदर रहना मानसिक और शारीरिक दोनों स्तर पर बेहद चुनौतीपूर्ण होता है।
बिना सूरज की रोशनी के गुजरते हैं कई महीने
पनडुब्बी मिशन के दौरान कई बार सैनिकों को 45 से 90 दिनों तक बिना सूरज की रोशनी के काम करना पड़ता है। यह स्थिति शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित करती है। दिन और रात का फर्क खत्म हो जाता है। ऐसे में कई सैनिकों को नींद से जुड़ी समस्याएं, थकान और मानसिक दबाव महसूस होता है। मिशन खत्म होने के बाद जमीन पर लौटने के बाद भी कई सैनिकों को सामान्य दिनचर्या में लौटने में समय लगता है।
पनडुब्बी के अंदर हवा भी होती है कृत्रिम
पनडुब्बी के अंदर प्राकृतिक हवा नहीं होती। वहां ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर रासायनिक प्रणालियों से नियंत्रित किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक इस वातावरण में रहने से सैनिकों को हल्का सिरदर्द, थकान और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। हालांकि नौसेना इन परिस्थितियों को संतुलित रखने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करती है।
बेहद संकरी होती है पनडुब्बी के अंदर की दुनिया
पनडुब्बियों के अंदर जगह बेहद सीमित होती है। गलियारे इतने संकरे होते हैं कि कई बार दो लोग मुश्किल से एक साथ गुजर पाते हैं। व्यायाम के लिए भी बहुत कम जगह होती है। लंबे मिशन के बाद कई सैनिकों को मांसपेशियों में कमजोरी और शारीरिक थकान महसूस होती है। इसके बावजूद सैनिक अपने अनुशासन और प्रशिक्षण के दम पर इन कठिन परिस्थितियों में भी पूरी क्षमता से काम करते हैं।
पनडुब्बी सेवा के लिए कठिन ट्रेनिंग
पनडुब्बी में सेवा करने के लिए नौसेना के जवानों को बेहद कठिन प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। विशाखापट्टनम स्थित प्रशिक्षण केंद्र में उम्मीदवारों को पानी से भरे टॉरपीडो ट्यूब से बाहर निकलकर गहराई से सतह तक तैरने की परीक्षा देनी होती है। इस दौरान सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है घबराहट पर नियंत्रण। जो उम्मीदवार इस परीक्षा में असफल हो जाते हैं उन्हें पनडुब्बी सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।
क्या कहते हैं मेडिकल एक्सपर्ट
रिटायर्ड सर्जन कमांडर डॉ. तरुण साहनी, जिन्होंने भारतीय नौसेना में 18 साल सबमरीन मेडिकल ऑफिसर के रूप में काम किया, बताते हैं कि पनडुब्बी सेवा के लिए सैनिकों का चयन बेहद सख्त प्रक्रिया से होता है। उनके अनुसार इस सेवा के लिए सिर्फ शारीरिक रूप से फिट ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद मजबूत लोगों को चुना जाता है। डॉ. साहनी का कहना है कि सबमरीन हेल्थ से जुड़े कई अध्ययन गोपनीय होते हैं, इसलिए इस विषय पर पूरी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
तनाव हार्मोन का स्तर ज्यादा पाया गया
विशेषज्ञों का मानना है कि पनडुब्बी में लंबे समय तक काम करने वाले सैनिकों में तनाव हार्मोन का स्तर सामान्य से अधिक पाया गया है। हालांकि यह भी सच है कि इस विषय पर व्यापक सार्वजनिक अध्ययन अभी तक सामने नहीं आया है। इसलिए लंबे समय में शरीर पर इसके प्रभावों को लेकर कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।