जस्टिस स्वामीनाथन की अदालत में मिसाल
मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन हाल ही में सुर्खियों में हैं। विपक्षी सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग की तैयारी की थी, यह आरोप लगाते हुए कि वे कई मामलों में धर्मनिरपेक्ष भावना के खिलाफ हैं। लेकिन जस्टिस स्वामीनाथन ने अदालत में अपनी टिप्पणी के जरिए यह साबित किया कि न्याय और इंसानियत हमेशा सर्वोपरि होती है।
मामला: 18 साल से लंबित कानूनी फीस
यह विवाद मदुरै नगर निगम के पूर्व वकील पी. थिरुमलाई से जुड़ा है। उन्होंने दावा किया कि निगम ने उनकी 13.05 लाख रुपये की कानूनी फीस का भुगतान नहीं किया। थिरुमलाई ने 1992 से 2006 तक नगर निगम का प्रतिनिधित्व किया। 818 मामलों में उनकी मेहनत के बावजूद, अदालत ने अधिकांश मांग खारिज कर दी। लंबे संघर्ष के बाद उन्हें जस्टिस स्वामीनाथन की बेंच में न्याय मिला।
पैगंबर मोहम्मद की शिक्षा और न्याय का संदेश
सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वामीनाथन ने पैगंबर मोहम्मद की प्रसिद्ध शिक्षा का हवाला दिया:
“मज़दूर की पसीना सूखने से पहले उसका मेहनताना दे दो।”
उन्होंने कहा कि यह केवल नैतिक उपदेश नहीं बल्कि न्याय और निष्पक्षता का मूल आधार है। यह सिद्धांत श्रम और सेवा कानूनों में भी लागू होता है।
वरिष्ठ वकीलों और असमान फीस पर टिप्पणी
जस्टिस ने यह चिंता जताई कि कुछ वरिष्ठ वकीलों को अत्यधिक फीस दी जाती है, जबकि मेहनत करने वाले वकील अपनी हक की राशि पाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करते हैं। इसे न्यायपालिका में असमानता और चिंता का विषय बताया।
अतिरिक्त महाधिवक्ताओं की कार्यप्रणाली पर नाराजगी
अतिरिक्त महाधिवक्ताओं की बड़ी संख्या और उनकी भूमिका पर जस्टिस ने नाराजगी जताई। उन्होंने इसे “शर्मिंदगी का विषय” कहा कि कभी कभी उन्हें ऐसे मामलों में लगाया जाता है जहां उनकी जरूरत नहीं होती। अदालत में समय मांगने की वजह से सुनवाई में देरी भी होती है।
अदालत का आदेश और भविष्य की उम्मीद
अदालत ने नगर निगम को निर्देश दिया: दो महीने के भीतर थिरुमलाई को बिना ब्याज के बकाया फीस का भुगतान करें। 2026 से मदुरै बेंच में ऐसी प्रथाओं में सुधार होने की उम्मीद। अतिरिक्त महाधिवक्ताओं की कार्यप्रणाली में सुधार की संभावना।
निष्कर्ष: न्याय और इंसानियत का संदेश
जस्टिस स्वामीनाथन की यह टिप्पणी न केवल थिरुमलाई के लिए राहत लेकर आई, बल्कि पूरे न्यायिक समुदाय को यह संदेश दिया कि मेहनत और नैतिकता का सम्मान होना चाहिए। यह घटना न्यायपालिका में संवेदनशील और निष्पक्ष दृष्टिकोण की मिसाल बन गई है।