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बरेली जंक्शन से रेलवे संपत्ति की बड़ी चोरी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। वॉशिंग लाइन और स्टोर से 142 कोचों की 1200 से ज्यादा बैटरियां गायब मिलीं, जिनकी कीमत करोड़ों में बताई जा रही है। कई दिनों तक मामला दबा रहने के बाद जब रिपोर्ट उच्च अधिकारियों तक पहुंची, तो उत्तर रेलवे के मुरादाबाद मंडल मुख्यालय में हड़कंप मच गया और जांच कमेटी गठित कर दी गई।

वॉशिंग लाइन और स्टोर—सुरक्षा के बीच सेंध

जंक्शन के पूर्वी आउटर पर स्थित वॉशिंग लाइन में ट्रेनों के कोचों की तकनीकी जांच और मरम्मत का काम होता है। यहां से ठीक-ठाक कर प्लेटफॉर्म पर कोच भेजे जाते हैं। पास में ही रेलवे स्टोर है, जहां पुरानी बैटरियां, वायरिंग और अन्य सामग्री रखी जाती है। इतनी संवेदनशील जगह—जहां आसपास रेलवे अस्पताल और कॉलोनी भी मौजूद है—वहीं से इतने बड़े पैमाने पर बैटरियां गायब हो जाना सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा सवाल है।

स्टॉक जांच में खुला राज

सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में जब स्टॉक का मिलान किया गया तो 1200 से ज्यादा बैटरियां कम पाई गईं। पहले इस पूरे प्रकरण को दबाने की कोशिश हुई, लेकिन मामला बढ़ता गया और आखिरकार विभागीय स्तर पर रिपोर्ट दर्ज करनी पड़ी।

अब सवाल यह है कि—

  • चोरी कब से हो रही थी?
  • क्या यह एक संगठित गिरोह का काम है?
  • क्या विभागीय मिलीभगत से मामला चलता रहा?

आरपीएफ की भूमिका पर सवाल

रेलवे संपत्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी Railway Protection Force (आरपीएफ) की होती है, जबकि प्लेटफॉर्म और यात्रियों से जुड़े मामलों को जीआरपी देखती है। इतने बड़े पैमाने पर चोरी होती रही और किसी को भनक तक नहीं लगी—यह तथ्य आरपीएफ की निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सूत्र बता रहे हैं कि आरपीएफ की कार्यप्रणाली की भी जांच के आदेश दिए गए हैं। अगर लापरवाही या मिलीभगत साबित हुई, तो कई अधिकारी घेरे में आ सकते हैं।

मंडल मुख्यालय तक गूंजी आवाज

मामले की गंभीरता को देखते हुए Northern Railway के मुरादाबाद मंडल मुख्यालय में हड़कंप मच गया। मंगलवार को स्टोर इंचार्ज समेत कई अधिकारियों को तलब किया गया। वरिष्ठ वाणिज्य प्रबंधक आदित्य गुप्ता ने पुष्टि की कि विभागीय जांच जारी है और जांच रिपोर्ट के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।

कितना है नुकसान?

हालांकि अभी सटीक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि 1200 से ज्यादा बैटरियों की कीमत करोड़ों में बैठ सकती है। अगर स्क्रैप और अन्य सामग्री भी गायब पाई गई तो नुकसान और बढ़ सकता है। रेलवे जैसी विशाल संस्था में स्टॉक प्रबंधन और ऑडिट सिस्टम की मजबूती पर यह घटना बड़ा सवालिया निशान है।

अंदर का खेल या बाहरी गिरोह?

यह मामला सिर्फ चोरी नहीं, बल्कि सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। इतनी बड़ी संख्या में बैटरियां ‘एक दिन’ में गायब नहीं हो सकतीं। आशंका है कि महीनों से धीरे-धीरे सामग्री बाहर निकाली जा रही थी।

क्या यह—

  • अंदरूनी कर्मचारियों की मिलीभगत का नतीजा है?
  • या बाहरी कबाड़ी नेटवर्क का संगठित खेल?
  • जांच कमेटी अब इन सभी एंगल्स पर पड़ताल कर रही है।

जनता की नजर—क्या होगा अगला कदम?

रेलवे परिसर में अस्पताल, कॉलोनी और नियमित गतिविधियों के बावजूद चोरी का खुलासा होना आम जनता को भी हैरान कर रहा है। स्थानीय लोगों में चर्चा है कि अगर इतनी बड़ी रेलवे संपत्ति सुरक्षित नहीं, तो और क्या सुरक्षित है?

अब सबकी निगाहें जांच कमेटी पर टिकी हैं—

  • क्या दोषियों तक पहुंच होगी?
  • या मामला फाइलों में दब जाएगा?

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