बरेली में गुरुवार को मिट्टी के दीयों की कतारों के बीच उम्मीद की एक नई रोशनी जगी। सीमित संसाधनों में जीवनयापन कर रहे एक कुम्हार परिवार के आंगन में जब कैंट बोर्ड की टीम पहुंची, तो यह सिर्फ निरीक्षण नहीं बल्कि वर्षों से उपेक्षित पारंपरिक हुनर को पहचान देने की पहल थी। ‘वोकल फॉर लोकल’ को जमीन पर उतारने का यह दृश्य न सिर्फ प्रेरक था, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की सोच का जीवंत उदाहरण भी बन गया।
पहल जिसने छू लिया दिल
गुरुवार को Bareilly Cantonment Board की टीम शहर के एक कुम्हार परिवार के घर पहुंची। आंगन में सजे सैकड़ों मिट्टी के दीये, पास में रखे अधबने मृद्भांड और धूप में सूखते दीपक—यह दृश्य किसी प्रदर्शनी से कम नहीं था। टीम ने कारीगर परिवार के कार्यस्थल का निरीक्षण किया और निर्माण प्रक्रिया को बारीकी से समझा। मिट्टी को गूंथने से लेकर आकार देने, धूप में सुखाने और फिर तैयार उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने की पूरी यात्रा को अधिकारियों ने करीब से देखा।
सीमित संसाधन, असीम मेहनत
निरीक्षण के दौरान यह सामने आया कि परिवार सीमित संसाधनों के बावजूद सैकड़ों की संख्या में दीये तैयार कर रहा है। न मशीन, न आधुनिक उपकरण—सिर्फ हाथों की कला और वर्षों का अनुभव। दीयों की कतारें धूप में चमक रही थीं, लेकिन उन कतारों के पीछे कड़ी मेहनत, आर्थिक संघर्ष और बाजार की अनिश्चितता भी साफ दिखाई दे रही थी। परिवार ने बताया कि त्योहारों के समय मांग बढ़ती है, लेकिन बाकी समय बिक्री ठप हो जाती है।
समस्याएं सुनीं, समाधान का वादा
कुम्हार परिवार ने विपणन की कमी, कच्चे माल की बढ़ती कीमत और वित्तीय सहायता के अभाव जैसी समस्याएं साझा कीं। इस पर तनु जैन, सीईओ, बरेली कैंटोनमेंट बोर्ड ने भरोसा दिलाया कि आगामी हस्तशिल्प मेलों, प्रदर्शनियों और सामुदायिक आयोजनों में स्थानीय कारीगरों को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने कहा कि स्थानीय शिल्प को बढ़ावा देना सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का भी प्रयास है।
वोकल फॉर लोकल’ को धरातल पर उतारने की कोशिश
‘वोकल फॉर लोकल’ केवल नारा नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव की सोच है। बोर्ड प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि स्थानीय उत्पादों की खरीद को बढ़ावा देकर ही छोटे कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। दीवाली जैसे त्योहारों पर चीनी लाइटों और मशीननिर्मित उत्पादों के बजाय मिट्टी के दीयों को अपनाना स्थानीय कारीगरों के लिए सीधा आर्थिक समर्थन है। यही सोच इस पहल के केंद्र में दिखाई दी।
संस्कृति और रोजगार का संगम
मिट्टी के दीये सिर्फ रोशनी का साधन नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा का प्रतीक हैं। पीढ़ियों से यह कला गांवों और कस्बों में जीवित रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इन कारीगरों को आधुनिक बाजार और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए तो उनकी आय में बड़ा बदलाव आ सकता है। ई-कॉमर्स और स्थानीय प्रदर्शनी उनके हुनर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच भी दे सकती है।
बाजार की जरूरत और प्रशासनिक सहयोग
स्थानीय कारीगरों का कहना है कि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत बाजार और स्थायी ऑर्डर की है। त्योहारों तक सीमित मांग उनकी आजीविका को स्थिर नहीं बना पाती। कैंट बोर्ड ने संकेत दिया है कि भविष्य में स्थानीय आयोजनों और सरकारी कार्यक्रमों में मिट्टी के उत्पादों का उपयोग बढ़ाया जाएगा। इससे कारीगरों को नियमित काम मिल सकेगा।
उम्मीद की नई रोशनी
यह पहल सिर्फ निरीक्षण भर नहीं थी, बल्कि एक संदेश भी था—कि परंपरा को बचाना प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। कुम्हार परिवार के चेहरे पर आई मुस्कान बताती है कि जब व्यवस्था और समाज साथ खड़े हों, तो छोटी सी चिंगारी भी बड़े बदलाव की लौ बन सकती है।