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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब वैश्विक ऊर्जा संकट का संकेत देने लगा है। दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास सैन्य हलचल बढ़ने से यह डर गहराने लगा है कि अगर यह रास्ता बंद हुआ तो दुनिया भर में ईंधन संकट खड़ा हो सकता है। इसी बीच एक बड़ी जानकारी सामने आई है कि भारत ने संभावित आपात स्थिति के लिए विशाल अंडरग्राउंड गुफाओं में 50 से 60 दिन का तेल सुरक्षित कर रखा है। ऐसे समय में जब कई देश सीमित भंडार के भरोसे हैं, भारत की यह तैयारी ऊर्जा सुरक्षा की बड़ी ढाल बन सकती है।

होर्मुज संकट ने दुनिया की बढ़ाई चिंता

पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है। खबरें हैं कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास बारूदी सुरंगें बिछाने की कोशिश की थी, जिसे अमेरिकी नौसेना ने नष्ट करने का दावा किया है। यह इलाका दुनिया के लिए बेहद अहम है क्योंकि वैश्विक कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यदि यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। भारत जैसे देशों के लिए यह खतरा और भी बड़ा है क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है। ऐसे हालात में हर देश अपने आपातकालीन तेल भंडार की स्थिति पर नजर रख रहा है।

भारत के पास कितना है इमरजेंसी तेल भंडार

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसी वजह से सरकार ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार करने की योजना बनाई थी। रिपोर्टों के मुताबिक भारत के पास रणनीतिक रिजर्व, रिफाइनरी स्टॉक और व्यावसायिक भंडार मिलाकर लगभग 50 से 60 दिन का तेल उपलब्ध है। यह लगभग 25 करोड़ बैरल यानी करीब 4000 करोड़ लीटर तेल के बराबर माना जाता है। हालांकि सभी टैंक पूरी तरह खाली नहीं किए जा सकते, इसलिए व्यावहारिक रूप से लगभग 40 दिन का उपयोगी तेल स्टॉक माना जाता है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा है कि देश में ईंधन की कमी नहीं है और सरकार स्थिति पर लगातार नजर रख रही है।

अंडरग्राउंड गुफाओं में सुरक्षित रखा गया तेल

भारत ने अपने रणनीतिक तेल भंडार को बेहद सुरक्षित स्थानों पर रखा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ये विशाल अंडरग्राउंड कैवर्न मुख्य रूप से विशाखापत्तनम, मंगलौर और पादुर में बनाए गए हैं। इन जगहों पर चट्टानों को काटकर बड़ी-बड़ी भूमिगत गुफाएं तैयार की गई हैं, जिनमें लाखों बैरल कच्चा तेल सुरक्षित रखा जाता है। इसके अलावा कुछ तेल भंडार तटीय टैंकों, पाइपलाइनों और समुद्री टैंकरों में भी स्टोर किया जाता है। इन अंडरग्राउंड कैवर्न का मकसद यही है कि युद्ध, आपूर्ति बाधित होने या वैश्विक संकट की स्थिति में देश की ऊर्जा जरूरतें अचानक प्रभावित न हों।

चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के तेल भंडार की स्थिति

एशिया में अगर तेल भंडार की तुलना करें तो चीन इस मामले में सबसे आगे है। रिपोर्टों के अनुसार चीन के पास लगभग 150 करोड़ बैरल तेल रिजर्व है, जो उसे करीब 90 से 100 दिनों तक ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने में मदद कर सकता है। वहीं पाकिस्तान की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है। उसके पास लगभग 28 दिन का पेट्रोल और डीजल स्टॉक बताया जाता है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक हो सकती है। दूसरी ओर बांग्लादेश के पास भी सीमित भंडार है और अनुमान के अनुसार उसके पास करीब 35 से 40 दिनों का तेल स्टॉक मौजूद है। यदि वैश्विक आपूर्ति बाधित होती है तो इन देशों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

युद्ध लंबा चला तो बढ़ेगा वैश्विक ऊर्जा संकट

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबा खिंचता है तो पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल हो सकती है। होर्मुज जलडमरूमध्य से रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल गुजरता है। अगर यह मार्ग बाधित हुआ तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। ऐसी स्थिति में कई देशों को अपने रणनीतिक भंडार का इस्तेमाल करना पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने भी जरूरत पड़ने पर देशों को अपने रिजर्व खोलने की सलाह दी है। फिलहाल भारत सरकार का दावा है कि देश ऊर्जा आपूर्ति के मामले में सुरक्षित है, लेकिन वैश्विक हालात तेजी से बदल रहे हैं और आने वाले समय में ऊर्जा सुरक्षा दुनिया की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती बन सकती है।

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