ईरान-इजरायल युद्ध के वैश्विक असर के बीच भारत में एलपीजी गैस सिलेंडर की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है। शहरों से लेकर गांवों तक कई जगह गैस की कमी की खबरें सामने आ रही हैं, जिसके चलते लोग अब बिजली से चलने वाले इंडक्शन चूल्हों की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव के साथ ही एक नया सवाल खड़ा हो गया—क्या इससे देश में बिजली की मांग अचानक बढ़ जाएगी और बिजली संकट पैदा हो सकता है? लेकिन केंद्रीय बिजली मंत्री मनोहर लाल का दावा है कि भारत की बिजली उत्पादन क्षमता इतनी मजबूत है कि चाहे जितनी मांग बढ़े, बिजली की कमी नहीं होने दी जाएगी।
गैस की किल्लत के बीच इंडक्शन चूल्हों की बढ़ती मांग
देश के कई हिस्सों में इन दिनों एलपीजी सिलेंडरों की सप्लाई सीमित होने की खबरें सामने आ रही हैं। खासकर शहरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी उपभोक्ताओं को समय पर सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं। इस स्थिति में लोगों ने विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है और बड़ी संख्या में परिवार इंडक्शन चूल्हों की ओर बढ़ रहे हैं। बिजली से चलने वाला यह उपकरण गैस की तुलना में आसान और तेज माना जाता है। इंडक्शन चूल्हों की मांग अचानक बढ़ने से बाजार में इनकी बिक्री भी तेजी से बढ़ी है। इलेक्ट्रॉनिक दुकानों के अनुसार पिछले कुछ दिनों में इंडक्शन स्टोव की बिक्री सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना ज्यादा हो गई है। हालांकि इसके साथ ही लोगों के मन में यह चिंता भी पैदा हो गई कि यदि लाखों परिवार इंडक्शन पर खाना बनाने लगेंगे तो बिजली की मांग अचानक बढ़ जाएगी और इससे बिजली संकट पैदा हो सकता है।
सरकार का दावा: बिजली उत्पादन क्षमता मांग से दोगुनी
केंद्रीय बिजली मंत्री मनोहर लाल ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए कहा है कि देश में बिजली उत्पादन की क्षमता मांग से कहीं ज्यादा है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार भारत में इस समय कुल इंस्टॉल्ड पावर जनरेशन कैपेसिटी 5,24,009 मेगावाट से अधिक है। इसके मुकाबले हाल ही में दर्ज अधिकतम बिजली मांग लगभग 2,36,203 मेगावाट रही है। यानी देश के पास मांग से लगभग दोगुनी उत्पादन क्षमता मौजूद है। मंत्री के अनुसार यदि बिजली की मांग अचानक बढ़ती भी है तो उत्पादन बढ़ाकर उसे पूरा किया जा सकता है। 12 मार्च 2026 को देश में 4676 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन किया गया, जो कुल मांग से भी ज्यादा था। सरकार का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में बिजली उत्पादन और वितरण प्रणाली में बड़े सुधार हुए हैं, जिससे मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो चुका है।
बदलते ऊर्जा परिदृश्य में बढ़ रही बिजली की भूमिका
भारत का ऊर्जा परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। पहले देश की ऊर्जा जरूरतें मुख्य रूप से थर्मल पावर प्लांट से पूरी होती थीं, लेकिन अब सरकार का फोकस अक्षय ऊर्जा पर भी बढ़ गया है। सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भारत तेजी से विस्तार कर रहा है। हालांकि इन स्रोतों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ये लगातार बिजली नहीं बना सकते। सौर ऊर्जा केवल दिन में उपलब्ध होती है और पवन ऊर्जा हवा की गति पर निर्भर करती है। इसी वजह से सरकार ऊर्जा मिश्रण को संतुलित रखने के लिए परमाणु ऊर्जा और हाइड्रो पावर जैसे विकल्पों पर भी जोर दे रही है। सरकार की योजना है कि आने वाले वर्षों में परमाणु ऊर्जा क्षमता को तेजी से बढ़ाया जाए ताकि जरूरत के समय लगातार बिजली उपलब्ध कराई जा सके।
सिंधु जल के उपयोग से बढ़ेगी हाइड्रो पावर क्षमता
सरकार ने सिंधु जल संधि को निलंबित करने के बाद सिंधु, झेलम और चेनाब नदियों के पानी के बेहतर उपयोग की दिशा में भी काम शुरू कर दिया है। जम्मू-कश्मीर में इन नदियों पर पहले से कई हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट मौजूद हैं, लेकिन उनमें जमा गाद के कारण उनकी क्षमता कम हो गई थी। अब इन परियोजनाओं के रिजर्वेयर में डिसिल्टिंग का काम शुरू किया गया है ताकि उनकी स्टोरेज और बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सके। इसके अलावा कुछ नए हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट लगाने की योजना भी तैयार की जा रही है। सरकार का लक्ष्य है कि इन नदियों के पानी का उपयोग करके अतिरिक्त बिजली पैदा की जाए और जरूरत पड़ने पर इसे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों तक पहुंचाया जा सके।
स्मार्ट मीटर और डिस्कॉम सुधार से बदलेगी बिजली व्यवस्था
बिजली वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए सरकार स्मार्ट मीटर लगाने की योजना पर भी तेजी से काम कर रही है। स्मार्ट मीटर से उपभोक्ताओं को अपनी बिजली खपत का सही आंकड़ा मिल सकेगा और वे जरूरत के अनुसार बिजली उपयोग को नियंत्रित कर सकेंगे। इसके अलावा बिजली वितरण कंपनियों यानी डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए भी कई कदम उठाए जा रहे हैं। पिछले दस वर्षों में AT&C लॉस लगभग 24 प्रतिशत से घटकर करीब 16 प्रतिशत रह गया है। इससे डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति बेहतर हुई है और कई कंपनियां अब मुनाफे में आ रही हैं। सरकार का मानना है कि ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने, वितरण प्रणाली को आधुनिक बनाने और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने से आने वाले वर्षों में भारत की बिजली व्यवस्था और मजबूत होगी।