नई दिल्ली। पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की गूंज अब वैश्विक रणनीतिक हलकों तक पहुंच गई है। अमेरिका के इंडो-पैसिफिक कमांड के प्रमुख एडमिरल सैमुएल जे. पपारो ने न केवल भारतीय सैन्य क्षमता की खुलकर सराहना की, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते सैन्य दबदबे पर भी गंभीर चिंता जताई। इस बयान ने एशिया की सामरिक राजनीति में नया भूचाल ला दिया है।
ऑपरेशन सिंदूर की गूंज वॉशिंगटन तक
पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना द्वारा किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के मंच पर भी हलचल मचा दी है। अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर एडमिरल सैमुएल जे. पपारो ने भारत की सामरिक परिपक्वता और टैक्टिकल एक्शन की खुलकर सराहना की। यह बयान उस समय आया है जब चीन की सैन्य सक्रियता हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है। एडमिरल पपारो का यह बयान महज कूटनीतिक औपचारिकता नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारत-अमेरिका रिश्तों में एक नई रणनीतिक दिशा के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
पहलगाम से ‘सिंदूर’ तक: जवाब जिसने बदल दिया समीकरण
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना ने जिस सटीकता और रणनीतिक दक्षता के साथ ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया, वह वैश्विक सैन्य विश्लेषकों के लिए भी अध्ययन का विषय बन गया है। पपारो ने साफ कहा कि “संघर्षों से सबक लेना और भविष्य के लिए तैयारी करना दोनों देशों की जिम्मेदारी है।” भारतीय सेना की प्रतिबद्धता और ऑपरेशन के बाद की सीखने की प्रक्रिया की उन्होंने सराहना की। यह बयान इशारा करता है कि अमेरिका भारत को सिर्फ एक क्षेत्रीय ताकत नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय रणनीतिक भागीदार के रूप में देख रहा है।
चीन के हथियार फेल? बड़ा संकेत
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान द्वारा इस्तेमाल किए गए चीनी रक्षा सिस्टम्स और लॉन्ग-रेंज हथियारों के फेल होने की खबरें सामने आई थीं। इस पर सवाल पूछे जाने पर पपारो ने लंबी दूरी की “किल चेन” क्षमताओं, सेंसर्स, कम्युनिकेशन और वॉरहेड सिस्टम्स की जटिलता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने संकेत दिया कि 21वीं सदी में युद्ध सिर्फ सीमा पर नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी, सूचना और स्पेस डोमेन में भी लड़े जाते हैं। ऐसे में किसी भी हथियार प्रणाली की नाकामी सिर्फ हार नहीं, बल्कि उसकी रणनीतिक कमजोरी का खुलासा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बयान चीन की सैन्य तकनीक पर अप्रत्यक्ष सवाल भी खड़ा करता है।
हिंद-प्रशांत: अगला बड़ा रणक्षेत्र?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दुनिया की 60% आबादी और 60% से अधिक वैश्विक GDP मौजूद है। साथ ही विश्व की सात सबसे बड़ी सेनाएं भी इसी क्षेत्र में सक्रिय हैं। चीन की बढ़ती समुद्री मौजूदगी और आक्रामक नीतियां अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। एडमिरल पपारो ने कहा कि रोकथाम (Deterrence) उनका सर्वोच्च कर्तव्य है। “सबसे खराब स्थिति का आकलन कर तैयार रहना जरूरी है।” यह बयान स्पष्ट करता है कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक को हल्के में लेने के मूड में नहीं है — और इस रणनीति में भारत की भूमिका केंद्रीय मानी जा रही है।
लोकतंत्र से लोकतंत्र का गठबंधन
पपारो ने भारत-अमेरिका संबंधों को “दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और सबसे बड़े लोकतंत्र” के रिश्ते के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि दोनों देश संप्रभुता, नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्री सुरक्षा जैसे मूल सिद्धांतों के लिए प्रतिबद्ध हैं। भारत द्वारा हिंद महासागर क्षेत्र में निभाई जा रही सुरक्षा भूमिका की उन्होंने खुलकर प्रशंसा की। यह बयान उस वक्त आया है जब भारत मालाबार, मिलान और COPE इंडिया जैसे अभ्यासों में सक्रिय भागीदारी कर रहा है।
रक्षा साझेदारी में नई रफ्तार
हाल ही में अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेगसेथ और भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच कुआलालंपुर में हुए समझौते ने रक्षा सहयोग को नई ऊंचाई दी है। अलास्का युद्ध अभ्यास से लेकर मालाबार सीरीज तक, दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यासों के जरिए सामरिक समन्वय को मजबूत कर रहे हैं। पपारो ने इस सहयोग को “बहुत मूल्यवान” बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ अभ्यास नहीं, बल्कि संभावित संकटों के लिए संयुक्त तैयारी है।
21वीं सदी का युद्ध: सिर्फ गोलियां नहीं, डेटा भी
एडमिरल पपारो ने आधुनिक युद्ध की बदलती तस्वीर पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भविष्य का युद्ध सूचना वातावरण, अंतरिक्ष, प्रति-अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और उन्नत तकनीकों में महारत रखने वालों के हाथ में होगा। कम दृश्यता, साइबर हमले, स्पेस वारफेयर — ये सब अब युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। भारत की तकनीकी प्रगति और रक्षा आधुनिकीकरण को देखते हुए अमेरिका इसे एक स्वाभाविक सहयोगी के रूप में देख रहा है।
क्या बदल रहा है वैश्विक संतुलन?
विश्लेषकों के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर और उस पर अमेरिकी प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि एशिया में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। चीन के बढ़ते प्रभाव के मुकाबले भारत को एक संतुलनकारी शक्ति के तौर पर पेश किया जा रहा है। यह बयान पाकिस्तान के लिए भी रणनीतिक संदेश माना जा रहा है — कि वैश्विक मंच पर समर्थन का झुकाव किस ओर है।