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कानपुर में सामने आए किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट ने स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव हिला दी है। यहां एक एंबुलेंस ड्राइवर स्टेथोस्कोप पहनकर खुद को डॉक्टर बताता था और गंभीर मरीजों को करोड़ों के खेल में फंसा देता था। पुलिस की कार्रवाई में जो खुलासे हुए हैं, वे चौंकाने के साथ-साथ डराने वाले भी हैं।

स्टेथोस्कोप के पीछे छिपा खेल: एंबुलेंस ड्राइवर बना सरगना

कानपुर में पुलिस ने जिस किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का पर्दाफाश किया है, उसका मास्टरमाइंड कोई बड़ा डॉक्टर नहीं बल्कि एक एंबुलेंस ड्राइवर निकला। शिवम अग्रवाल नाम का यह युवक गले में स्टेथोस्कोप डालकर खुद को डॉक्टर के रूप में पेश करता था और मरीजों का भरोसा जीतता था। पुलिस जांच में सामने आया है कि वह अस्पतालों और डायलिसिस सेंटरों के बाहर घूम-घूमकर गंभीर मरीजों को निशाना बनाता था। उसकी बातचीत और हावभाव इतने पेशेवर होते थे कि लोग आसानी से उसके झांसे में आ जाते थे।

डॉक्टर दंपती समेत 6 गिरफ्तार: शहर से बाहर तक फैला नेटवर्क

इस सनसनीखेज मामले में पुलिस ने दो डॉक्टरों समेत कुल छह लोगों को गिरफ्तार किया है। जांच में यह भी सामने आया है कि इस रैकेट के तार मेरठ और अन्य शहरों से जुड़े हुए हैं। अब तक 40 से 50 संदिग्ध किडनी ट्रांसप्लांट होने की बात सामने आई है, जिनमें से 7 से 8 मामले एक ही अस्पताल से जुड़े पाए गए हैं। एक अफ्रीकी महिला का ट्रांसप्लांट भी यहां कराया गया था, जिससे इस पूरे नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन होने की आशंका और गहरी हो गई है।

60 लाख से 1 करोड़ का सौदा: जिंदगी बनी बाजार की वस्तु

इस गिरोह का पूरा खेल पैसों पर आधारित था। मरीजों को बिना कानूनी प्रक्रिया के किडनी ट्रांसप्लांट कराने का लालच दिया जाता था, जिसकी कीमत 60 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपये तक तय की जाती थी। डोनर भी पैसों के लालच में तैयार किए जाते थे। एक मामले में बिहार का एक MBA छात्र पैसों की जरूरत के चलते किडनी देने को राजी हो गया। ब्लड ग्रुप मैच होते ही ऑपरेशन की तैयारी शुरू कर दी गई। इस तरह इंसानी जिंदगी को खुलेआम सौदे में बदल दिया गया था।

अस्पताल बना गुप्त अड्डा: बिना रिकॉर्ड होते थे ऑपरेशन

पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि ऑपरेशन के दिन अस्पताल का पूरा स्टाफ हटा दिया जाता था। इसके बाद एक विशेष सर्जिकल टीम आती थी और ट्रांसप्लांट को अंजाम देती थी। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन मरीजों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था। ऑपरेशन के बाद मरीजों को अलग-अलग जगह भेज दिया जाता था ताकि वे एक-दूसरे से संपर्क न कर सकें। पूरी प्रक्रिया इतनी गोपनीय रखी जाती थी कि अगर पुलिस जांच भी करे, तो सबूत मिलना मुश्किल हो।

टेलीग्राम पर चलता था खेल: डिजिटल प्लेटफॉर्म बना सौदे का जरिया

यह रैकेट सिर्फ जमीन पर ही नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी सक्रिय था। मेरठ के एक डॉक्टर द्वारा टेलीग्राम ग्रुप बनाया गया था, जहां डोनर और रिसीवर को सीधे जोड़ा जाता था। इसी प्लेटफॉर्म के जरिए मेरठ की एक महिला और बिहार के युवक के बीच संपर्क कराया गया। महिला से 80 लाख रुपये लेकर ट्रांसप्लांट कराया गया, जबकि डोनर को केवल 10 लाख रुपये दिए गए। इस तरह तकनीक का इस्तेमाल करके अवैध कारोबार को और मजबूत बनाया गया।

ऑपरेशन के बाद बिगड़ी हालत: जिंदगी से खेल का खौफनाक अंजाम

इस पूरे खेल का सबसे दर्दनाक पहलू ऑपरेशन के बाद सामने आया। 80 लाख रुपये खर्च करने के बावजूद महिला मरीज की हालत गंभीर हो गई और उसे लखनऊ के पीजीआई में भर्ती कराना पड़ा। डोनर युवक की हालत भी ठीक नहीं बताई जा रही है। दोनों ही जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।

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