Social Sharing icon

भारत लंबे समय तक दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश माना जाता रहा है, लेकिन अब तस्वीर धीरे-धीरे बदलती दिखाई दे रही है। देश के कई हिस्सों में जन्मदर तेजी से गिर रही है और सिक्किम इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है, जहां कुल प्रजनन दर (TFR) 1.1 तक गिर गई है—जो जापान जैसे बूढ़ी आबादी वाले देश से भी कम है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही रुझान जारी रहा तो आने वाले दशकों में भारत को तेजी से बूढ़ी होती आबादी, घटती कार्यशक्ति और आर्थिक दबाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

जनसंख्या संतुलन पर मंडराता खतरा

भारत में घटती फर्टिलिटी दर अब एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चिंता बनती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह रुझान जारी रहा तो आने वाले दशकों में देश की जनसंख्या संरचना पूरी तरह बदल सकती है। वर्तमान में भारत की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) लगभग 1.9 से 2.0 के बीच है, जबकि स्थिर जनसंख्या बनाए रखने के लिए यह दर कम से कम 2.1 होनी चाहिए। यह गिरावट पहली नजर में मामूली लग सकती है, लेकिन लंबे समय में इसका प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। अनुमान है कि 2050 तक भारत की कुल आबादी में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका मतलब यह होगा कि देश में काम करने वाली युवा आबादी का अनुपात घटेगा और बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ेगी, जिससे सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ सकता है।

सिक्किम बना सबसे बड़ा उदाहरण

देश में घटती जन्मदर की सबसे गंभीर तस्वीर सिक्किम में दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में सिक्किम का TFR घटकर 1.1 रह गया है। इसका अर्थ है कि एक महिला औसतन केवल 1.1 बच्चे को जन्म दे रही है। यह आंकड़ा जापान जैसे विकसित लेकिन तेजी से बूढ़े हो रहे देश से भी कम है, जहां TFR लगभग 1.3 है। दिलचस्प बात यह है कि 2005-06 में सिक्किम का TFR करीब 2.0 था, जो 2015-16 में घटकर 1.2 पर आ गया और अब 1.1 तक पहुंच गया है। यानी पिछले दो दशकों में जन्मदर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में राज्य की आबादी में बच्चों की संख्या तेजी से घट सकती है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ सकती है, जिससे सामाजिक संरचना पर भी असर पड़ेगा।

सरकार के प्रोत्साहन, लेकिन असर सीमित

सिक्किम सरकार ने गिरती जन्मदर को रोकने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं, लेकिन अब तक इनका असर बहुत सीमित दिखाई दे रहा है। वर्ष 2022 में सरकार ने ‘वात्सल्य योजना’ शुरू की, जिसके तहत उन दंपतियों को आर्थिक सहायता दी जाती है जिन्हें संतान प्राप्ति में कठिनाई होती है। इस योजना के तहत इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) जैसे महंगे इलाज के लिए प्रत्येक दंपति को तीन लाख रुपये तक की मदद दी गई। योजना शुरू होने के बाद 38 महिलाओं ने पंजीकरण कराया, जिससे उम्मीद जगी कि शायद बांझपन भी कम जन्मदर का एक कारण हो सकता है। इसके अलावा सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रोत्साहन योजनाएं भी शुरू कीं। दूसरे बच्चे के जन्म पर वेतन वृद्धि, तीसरे बच्चे पर अतिरिक्त वेतन वृद्धि, महिला कर्मचारियों के लिए एक वर्ष की मातृत्व अवकाश और पुरुषों के लिए पितृत्व अवकाश जैसी सुविधाएं दी गईं। निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए भी आर्थिक सहायता की व्यवस्था की गई। इसके बावजूद जन्मदर में अपेक्षित सुधार नहीं दिख रहा है।

दुनिया के कई देशों में भी यही संकट

सिक्किम की स्थिति दुनिया के कई विकसित देशों जैसी होती जा रही है, जहां जन्मदर लगातार गिर रही है। उदाहरण के तौर पर सिंगापुर में TFR लगभग 1.0 के आसपास है। वहां दशकों से सरकार बेबी बोनस, टैक्स रिबेट, सस्ती चाइल्ड केयर और हाउसिंग प्रोत्साहन जैसी योजनाएं चला रही है, लेकिन जन्मदर में खास सुधार नहीं हुआ। दक्षिण कोरिया की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां TFR 0.7 तक गिर चुका है—जो दुनिया में सबसे कम माना जाता है। जापान भी लंबे समय से इस समस्या से जूझ रहा है। वहां सरकार ने परिवारों को आर्थिक सहायता, चाइल्ड केयर सुविधाएं और लंबी पेरेंटल लीव जैसी नीतियां लागू कीं, लेकिन फिर भी जन्मदर स्थिर नहीं हो सकी। हालांकि यूरोप के हंगरी में कुछ हद तक सफलता मिली है। वहां सरकार ने हाउसिंग सब्सिडी, कम ब्याज पर कर्ज और अधिक बच्चों वाली महिलाओं को आयकर में छूट जैसी योजनाएं लागू की, जिससे TFR 1.23 से बढ़कर लगभग 1.5 तक पहुंच गया।

भविष्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत में जन्मदर लगातार गिरती रही तो इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। युवा आबादी किसी भी देश की आर्थिक ताकत मानी जाती है, क्योंकि वही उत्पादन, नवाचार और श्रमशक्ति का आधार होती है। लेकिन जब जन्मदर कम होती है तो धीरे-धीरे कार्यशील आबादी घटने लगती है और बुजुर्गों की संख्या बढ़ जाती है। इससे पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ता है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भारत को अभी से इस चुनौती के लिए रणनीति तैयार करनी होगी। इसमें परिवार-हितैषी नीतियां, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, महिलाओं के लिए काम और मातृत्व के बीच संतुलन बनाने वाली नीतियां तथा सामाजिक जागरूकता अभियान शामिल हो सकते हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में भारत को भी जापान और दक्षिण कोरिया जैसी जनसंख्या चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *