नई दिल्ली। बांग्लादेश में एक हिंदू युवक की नृशंस मॉब लिंचिंग ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। कथित ईशनिंदा के आरोप में 27 वर्षीय दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने और उसके शव को पेड़ से लटकाकर आग लगाए जाने की घटना को लेकर देश-विदेश में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इस जघन्य वारदात पर ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के चीफ इमाम डॉ. इमाम उमर अहमद इलियासी ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “इंसानियत का कत्ल” बताया है।
डॉ. इलियासी ने कहा कि जिस बेरहमी से युवक की हत्या की गई और मौत के बाद भी उसके शव के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया, वह सभ्य समाज के लिए कलंक है। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि भारत ने हमेशा मुश्किल समय में बांग्लादेश का साथ दिया है, लेकिन आज वही बांग्लादेश इस “एहसान” को भूलता हुआ नजर आ रहा है। उन्होंने ऐसे तत्वों को “एहसान फरामोश” बताते हुए उनकी मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
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चीफ इमाम ने इस घटना को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी पर भी नाराज़गी जताई। उन्होंने सवाल किया कि जब खुलेआम भीड़ द्वारा हत्या की जा रही है, तब मानवाधिकारों की बात करने वाले संगठन क्यों खामोश हैं। साथ ही उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस तरह की हिंसा का इस्लाम से कोई संबंध नहीं हो सकता। “इस्लाम किसी भी हाल में निर्दोष की हत्या की इजाज़त नहीं देता,” उन्होंने कहा।
डॉ. इलियासी ने भारत सरकार से भी इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से आग्रह किया कि भारत को अपने कूटनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए बांग्लादेश सरकार पर निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई के लिए दबाव बनाना चाहिए।
गौरतलब है कि यह घटना बांग्लादेश के मैमनसिंह ज़िले में हुई, जहां मजदूरी करने वाले दीपू चंद्र दास पर कथित ईशनिंदा का आरोप लगाकर पहले फैक्टरी के बाहर भीड़ ने हमला किया। पुलिस के अनुसार, युवक को बेरहमी से पीटने के बाद पेड़ से लटका दिया गया और बाद में शव को ढाका–मैमनसिंह राजमार्ग के किनारे फेंककर आग लगा दी गई। सूचना मिलने पर पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शव को बरामद किया और पोस्टमॉर्टम के लिए मैमनसिंह मेडिकल कॉलेज भेजा।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने इस मामले में अब तक 10 लोगों की गिरफ्तारी की पुष्टि की है। यह घटना ऐसे समय में हुई है जब देश पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता और हिंसक घटनाओं के दौर से गुजर रहा है।
यह वारदात न सिर्फ अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक चेतावनी भी है कि भीड़ की हिंसा किस हद तक इंसानियत को कुचल सकती है।