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भीड़भाड़ वाले शहरों में कबूतरों से स्वास्थ्य जोखिम: क्या अब लगेगा पूरा प्रतिबंध?

कर्नाटक में जल्द ही कबूतरों को सार्वजनिक स्थानों पर दाना देने पर कड़ी पाबंदी लग सकती है। यह कदम स्वास्थ्य विभाग की चेतावनी और बढ़ती शहरी आबादी में सांस संबंधी बीमारियों के खतरे को देखते हुए उठाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कुत्तों को खुले में खाना देने पर रोक लगाई थी, और अब इसी तर्ज पर कबूतरों के लिए भी प्रतिबंध लागू होने की संभावना है।

कर्नाटक सरकार की योजना है कि घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में कबूतरों को बिना नियंत्रण के खाना खिलाने पर रोक लगाई जाए। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने इस संबंध में शहरी विकास विभाग को पत्र लिखकर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने का आग्रह किया है। पत्र में यह सुझाव भी दिया गया है कि जरूरत पड़ने पर पूरे शहर में सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों को दाना देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

स्वास्थ्य विभाग ने विशेष रूप से चेतावनी दी है कि भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में कबूतरों की बीट और पंखों का जमा होना गंभीर स्वास्थ्य खतरा बन सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक इन पक्षियों के संपर्क में रहने से फेफड़ों की गंभीर बीमारियां जैसे हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनिटिस हो सकती हैं। कमजोर आबादी में यह फेफड़ों को स्थायी नुकसान भी पहुंचा सकता है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य और कानूनी आधार

स्वास्थ्य विभाग ने पत्र में यह भी स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता की सुरक्षा के लिए स्थानीय निकायों को जुर्माना लगाने और कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार दिया जा सकता है। भारतीय न्याय संहिता-2023 की धारा 270, 271 और 272 के तहत यह कदम जायज ठहराया गया है। इसके अलावा, ग्रेटर बेंगलूरु अथॉरिटी एक्ट-2025 और कर्नाटक नगर निगम अधिनियम-1976 के प्रावधान भी नागरिक निकायों को सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए निवारक कदम उठाने का अधिकार देते हैं।

पत्र में यह भी कहा गया है कि कुछ इलाकों में नियंत्रित परिस्थितियों में और निश्चित समय-सारणी के अनुसार फीडिंग की अनुमति दी जा सकती है। इसके लिए विशेष फीडिंग जोन बनाए जाएंगे, जिनका रखरखाव मान्यता प्राप्त चैरिटेबल संगठनों या गैर-सरकारी संस्थाओं के जिम्मे होगा।

मुंबई का उदाहरण

मुंबई में बॉम्बे हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद बृहद मुंबई नगर निगम ने पहले ही ऐसे नियम लागू कर रखे हैं। मुंबई के अनुभव ने यह साबित किया है कि नियंत्रित फीडिंग जोन स्वास्थ्य और स्वच्छता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। कर्नाटक में भी इसी तर्ज पर कदम उठाए जाने की संभावना है।

नागरिकों के लिए संदेश और वैकल्पिक उपाय

स्वास्थ्य विभाग ने नागरिक निकायों को सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। इस अभियान के तहत नागरिकों को कबूतरों को खाना खिलाने से जुड़ी स्वास्थ्य जोखिम, नियमों का उल्लंघन करने पर दंड और पक्षियों के संरक्षण के वैकल्पिक तरीके के बारे में जानकारी दी जाएगी।

वैकल्पिक तरीकों में शामिल हैं:

नियंत्रित फीडिंग जोन में सीमित समय पर दाना देना।

मान्यता प्राप्त चैरिटेबल संस्थाओं के माध्यम से फीडिंग करना।

रिहायशी इलाकों में निजी स्तर पर सुरक्षित और स्वच्छ फीडिंग पद्धति अपनाना।

विरोध और सामाजिक प्रतिक्रिया

हालांकि, रिहायशी इलाकों में कबूतरों को कई वर्षों से दाना देने वाले लोग स्वास्थ्य मंत्रालय की चेतावनी से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि पक्षियों के प्रति यह प्रतिबंध संवेदनशीलता और मानवीय भावनाओं के खिलाफ हो सकता है।

पूर्व मंत्री और भाजपा विधायक एस. सुरेश कुमार ने भी जीबीए के मुख्य आयुक्त को पत्र लिखकर इसी तरह की नियामक उपायों की मांग की थी। यह दर्शाता है कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इस विषय पर बहस जारी है।

भविष्य की दिशा

कर्नाटक सरकार का यह कदम केवल स्वास्थ्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह शहरी सफाई, सार्वजनिक स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। यदि यह योजना लागू होती है, तो नागरिकों को जिम्मेदारी और जागरूकता के साथ पक्षियों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना होगा। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, अगले कुछ महीनों में राज्यभर के सभी नगर निगमों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। इन निर्देशों का पालन न करने पर जुर्माना और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शहरों में रहने वाले लोग और कबूतर दोनों सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण में रह सकें।

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