ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं। हिजाब पहनने वाली महिला के देश की प्रधानमंत्री बनने की बात कहकर उन्होंने न सिर्फ एक राजनीतिक बहस छेड़ दी, बल्कि विरोध करने वालों पर तीखा हमला भी किया। ओवैसी ने कहा कि अगर किसी को इस सपने से परेशानी है, तो वह “पाकिस्तान की भाषा बोल रहा है”, जिसके बाद सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
नई दिल्ली: AIMIM प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। एक बार फिर उन्होंने ऐसा बयान दिया है, जिसने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। ओवैसी ने कहा कि एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब हिजाब पहनने वाली महिला भारत की प्रधानमंत्री बनेगी और ऐसा सपना देखने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता।
ओवैसी का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब देश में पहचान, धर्म, पहनावे और संविधान को लेकर लगातार बहस चल रही है। उनके बयान ने जहां एक वर्ग को उम्मीद और हौसला दिया है, वहीं विरोधी दलों ने इसे भड़काऊ और विभाजनकारी करार दिया है।
किस सवाल पर भड़के ओवैसी?
महाराष्ट्र नगर निगम और महानगरपालिका चुनावों के प्रचार के दौरान जब पत्रकारों ने ओवैसी से उनके पुराने बयान को लेकर सवाल किया, तो वे तीखे अंदाज में जवाब देते नजर आए। उन्होंने कहा—
“क्या यह अपराध है कि मैं एक हिजाब पहनी महिला को भारत का प्रधानमंत्री बनते देखने का सपना देखता हूं? क्या भारत का संविधान हमें सपना देखने से रोकता है?”
ओवैसी ने आगे कहा कि अगर किसी को इस सोच से दिक्कत है, तो वे “पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं।” यही लाइन इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह बन गई।
हिजाब विवाद से जुड़ा है बयान
दरअसल, बिहार में एक ज्वैलरी शॉप में बुर्का और हिजाब पहनकर प्रवेश पर लगाए गए बैन के बाद ओवैसी ने प्रतिक्रिया दी थी। उसी संदर्भ में महाराष्ट्र के सोलापुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि भारत का संविधान पाकिस्तान से कहीं बेहतर है और यहां कोई भी नागरिक प्रधानमंत्री बन सकता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि—
“भारत में लोकतंत्र है, यहां सपनों पर कोई पाबंदी नहीं है। एक दिन हिजाब पहनने वाली महिला देश का नेतृत्व करेगी।”
चुनावी सफलता से बढ़ा आत्मविश्वास
ओवैसी का आत्मविश्वास इन दिनों सातवें आसमान पर है। बिहार विधानसभा चुनावों में AIMIM ने एक बार फिर पांच सीटों पर जीत दर्ज की। इसके अलावा महाराष्ट्र के नगर निगम और महानगरपालिका चुनावों में भी पार्टी का प्रदर्शन पहले से बेहतर रहा है।
ओवैसी ने कहा—
“हमने 125 सीटें जीती हैं। एक महीने पहले 75 सीटें जीती थीं। जब आप जनता का दिल जीतते हैं, तभी जीत मिलती है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि AIMIM सालों से जमीनी स्तर पर काम कर रही है और उसका असर अब चुनावी नतीजों में दिख रहा है।
बीजेपी और केंद्र सरकार पर हमला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के घुसपैठियों को लेकर दिए गए बयान पर भी ओवैसी ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि—
“बीजेपी 11 साल से सत्ता में है, लेकिन भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग तक पूरी नहीं कर पाई।”
उन्होंने बांग्लादेश में जारी अस्थिरता को भारत के लिए खतरा बताया और केंद्र सरकार की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए।
ट्रंप और ट्रेड डील का जिक्र
ओवैसी ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रतिनिधि के बयान का हवाला देते हुए कहा कि—
“ट्रंप के प्रतिनिधि कहते हैं कि मोदी जी ने फोन नहीं किया, इसलिए ट्रेड डील नहीं हुई। चीन से इन्वेस्टमेंट की बात हो रही है—इन सवालों का जवाब कौन देगा?”
इस बयान के जरिए ओवैसी ने सरकार की अंतरराष्ट्रीय नीति पर भी निशाना साधा।
आगे कहां चुनाव लड़ेगी AIMIM?
जब उनसे पूछा गया कि क्या AIMIM पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव लड़ेगी, तो ओवैसी ने साफ शब्दों में कहा—
“पार्टी नेताओं से चर्चा के बाद सही समय पर सही फैसला लिया जाएगा।”
बयान का राजनीतिक असर
ओवैसी का बयान आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। जहां समर्थकों ने इसे लोकतांत्रिक सोच और संविधान में आस्था बताया, वहीं विरोधियों ने इसे धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश करार दिया।
विशेषज्ञों का मानना है कि ओवैसी का यह बयान आने वाले चुनावों में उनकी पार्टी के कोर वोटबैंक को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
संविधान बनाम सोच की लड़ाई
ओवैसी लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अवसर देता है। उनका कहना है कि अगर कोई महिला, चाहे वह किसी भी पहनावे में हो, प्रधानमंत्री बनने का सपना देखती है तो वह उसका संवैधानिक अधिकार है।
ओवैसी का बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि देश में चल रही पहचान और अधिकारों की बहस का प्रतिबिंब है। यह बयान समर्थन और विरोध—दोनों को जन्म दे रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बयान ओवैसी और AIMIM के राजनीतिक भविष्य को किस दिशा में ले जाता है।