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प्रयागराज में माघ मेले के दौरान गंगा स्नान को लेकर एक बड़ा और संवेदनशील विवाद सामने आया है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती मौनी अमावस्या पर पूरे सम्मान और प्रोटोकॉल के साथ संगम स्नान की मांग को लेकर दूसरे दिन भी अनशन पर बैठे हैं। प्रशासन द्वारा सीमित संख्या में पैदल स्नान का विकल्प दिए जाने के बावजूद शंकराचार्य अपनी मांग पर अड़े हुए हैं, जिससे साधु-संतों और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बन गई है।

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माघ मेले के दौरान एक गंभीर और संवेदनशील स्थिति उत्पन्न हो गई है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती गंगा स्नान को लेकर प्रशासन से नाराज़ होकर दूसरे दिन भी अनशन पर बैठे हुए हैं। यह अनशन न केवल धार्मिक हलकों में बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया है। शंकराचार्य रविवार दोपहर से अपने शिविर में अनशन पर हैं। उनकी मुख्य मांग है कि उन्हें मौनी अमावस्या के अवसर पर पूरे सम्मान, परंपरागत पालकी और निर्धारित प्रोटोकॉल के साथ संगम नोज तक ले जाकर गंगा स्नान कराया जाए। उनका कहना है कि शंकराचार्य पद कोई सामान्य पद नहीं है और इसकी अपनी धार्मिक गरिमा व परंपरा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मौनी अमावस्या पर कैसे शुरू हुआ विवाद

मौनी अमावस्या के दिन संगम नोज पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी थी। प्रशासन के अनुसार, उस दिन करीब 4.52 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान किया। इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती था।

इसी बीच शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों और भक्तों के साथ पालकी में बैठकर संगम स्नान के लिए निकले। प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए उन्हें सीमित संख्या में पैदल जाकर स्नान करने का विकल्प दिया, लेकिन शंकराचार्य इस प्रस्ताव पर सहमत नहीं हुए। उनका कहना था कि जब अन्य अवसरों पर प्रोटोकॉल का पालन किया जाता है, तो मौनी अमावस्या जैसे पावन पर्व पर उसे क्यों रोका जा रहा है। इसी बात को लेकर शंकराचार्य के शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति भी बन गई, जिसके बाद उन्हें वापस लौटा दिया गया।

शिविर में शुरू हुआ अनशन

संगम स्नान की अनुमति न मिलने के बाद शंकराचार्य माघ मेले में गंगा नदी के उस पार सेक्टर-4, त्रिवेणी रोड स्थित अपने शिविर लौट आए। वहीं उन्होंने अनशन शुरू कर दिया, जो दूसरे दिन भी जारी है। शंकराचार्य का कहना है कि यह अनशन किसी व्यक्तिगत सुविधा के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक परंपराओं और सम्मान की रक्षा के लिए है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक प्रशासन उनकी मांग नहीं मानता, तब तक वह अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में रखेंगे पक्ष

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने घोषणा की है कि वह सोमवार दोपहर 12 बजे अपने शिविर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस पूरे मामले पर अपनी बात रखेंगे। माना जा रहा है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद मामला और भी तूल पकड़ सकता है। उनके समर्थक साधु-संत और शिष्य बड़ी संख्या में शिविर में मौजूद हैं और प्रशासन के रवैये को अपमानजनक बता रहे हैं।

प्रशासन की सफाई

दूसरी ओर, प्रयागराज प्रशासन ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। प्रशासन का कहना है कि वे सभी साधु-संतों, कल्पवासियों और श्रद्धालुओं का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन इतनी भारी भीड़ के बीच किसी भी तरह की विशेष व्यवस्था करना अव्यवस्था और सुरक्षा खतरे को जन्म दे सकता है। प्रशासन के अनुसार, संगम नोज पर हालात इतने संवेदनशील थे कि किसी को भी विशेष प्रोटोकॉल देना संभव नहीं था। अधिकारियों का कहना है कि नियम सभी के लिए समान हैं और व्यवस्था बनाए रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।

अन्य साधु-संतों की प्रतिक्रिया

इस विवाद पर देश के कई प्रमुख साधु-संतों ने भी प्रतिक्रिया दी है। कुछ संतों ने शंकराचार्य के अनशन का समर्थन किया, तो वहीं कई संतों ने इसकी आलोचना भी की। आलोचना करने वाले संतों का कहना है कि यह कुंभ मेला नहीं है, जहां अमृत स्नान के लिए विशेष प्रोटोकॉल दिया जाए। जब करोड़ों श्रद्धालु संगम में स्नान कर रहे हों, तब किसी एक व्यक्ति या समूह के लिए विशेष सुविधा की मांग उचित नहीं है। उनका यह भी कहना है कि सिंहासन, पालकी और बड़ी संख्या में शिष्यों के साथ स्नान करने से अव्यवस्था फैल सकती है, जिससे आम श्रद्धालुओं को परेशानी हो सकती है।

धार्मिक परंपरा बनाम प्रशासनिक व्यवस्था

यह पूरा विवाद अब केवल गंगा स्नान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल खड़ा कर रहा है कि धार्मिक परंपराओं और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक ओर शंकराचार्य अपने पद की धार्मिक गरिमा और परंपरा की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर प्रशासन जनसुरक्षा और व्यवस्था को सर्वोपरि बता रहा है।

क्या होगा अगला कदम?

फिलहाल शंकराचार्य का अनशन जारी है और प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है। अगर जल्द समाधान नहीं निकलता, तो यह मामला और भी गंभीर रूप ले सकता है। अब सबकी निगाहें शंकराचार्य की प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कोई मध्यस्थ समाधान निकलता है या यह टकराव और गहराता है।

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